Monday, April 14, 2014

उस दिन उसकी हंसी में एक नदी थी. !



१(१)
उस दिन
वह बहुत साधारण तरीके से
खूबसूरत था
वैसे ही जैसे
मन से खिला कॊई
भोला सा फूल,
यूं ही बिखरे
कुछ अच्छॆ रंगों का संयोजन,
कुछ धीमी मुस्कुराहटॊं,
चेहरे पर भाप जैसी जम आयी
छोटी छोटी कुछ खुशियों
और थोड़े से संकोच से
मिलकर बने एक सपने सा !

लगा ऐसे कि ऊपर की पहाड़ी पर
सफेद बादलॊं की बांसुरी बजाते
अकेले पाईन के मन से
वो छुपी हुयी रहस्यमयी नरम सी बात
निकल कर
ढ़लानों पर पेड़ों पर पत्तों पर
बिखर सी गयी है ,
उसने वही
बिना शब्दों वाली एक बात
उठाकर अपने जूड़े में धर ली है
और एक बात
अपने हिय में !

अब उसके पूरे वजूद में
कोई वैसी ही बात है   
जो  दूर शिखर पर
धरती और आकाश सिलते
सांवली कपासी धुंध में
जलते बुझते,
खुद में से उगते
खुद में ही समाते
शब्दों के भीतर की सौम्य निस्तब्धता चुनकर
अगरबत्ती के धुएं-सा,
उन्हें बादलॊं की
निस्पृह सफेदी में पोतते
उस पाईन ट्री के
चुपचाप
खड़े होने में है !


(२)
उस दिन
उसकी झर झर
बरस पड़ी हंसी से
एक नदी निकली थी.

सूरज से वह थोड़ी
लाल सी चमक
अपने माथे पर
मीज आया ही था
कि आकाश की ललरी हेरने को उत्सुक
अपनी ठुड्डी उठाये
लण्ठ पहाड़ों की देह पर लटकी
गंवई हरे रंग की बरसात लतफथ
जंगलॊं की मोटी चादर पर ठनकती
कनेरी धूप से अकबक
भाप की तितलियों को यहां वहां पराते देख
कुछ यूं फूट पड़ी उसकी खिलखिलाहटॆं
कि जैसे
सबसे ऊचें पहाड़ों के पीछे से
फूट पड़ा हो
कोई नवल धवल प्रबल शुभ्र प्रपात !

तब हवा की सुशील बेटियों ने
की बहुत कोशिश अथक !
बनायी उन्होंने हवा की अंजुरी
सिलकर चिड़ियों की हूंक के रेशे से
प्रौढ़ हो रही दुपहर से सकुचाते हुये
मांगी पुराने अनुभवों की नॊंक
और थामना चाहा
झरती हुयी हंसी के उस आलोड़न को
अपनी पोटलियों में
लेकिन .....
उस दिन उसकी हंसी में तो एक नदी थी !

एक लम्बी पूरी खिलखिलाहट बाद
लिया उसने अल्प विराम
और ढ़लते अपरान्ह की जर्द पीली धूप से
चुरायी अधूरे प्यारों की कई
उदासी भरी वो चीज
जो शब्दों के छूते ही
पीली धूप की रोशनाई में कविताएं बन जाती थी!
लेकिन बहुत सहेज कर उसने उन्हें
अपने अल्पविरामी सन्नाटॆ के डब्बे में
रखा एकदम बन्द कसकर !
शब्दॊं से बहुत बहुत दूर !

पुनः जब फूट पड़ा
उस गदरायी हंसी का झरना
तो स्नेहमयी आश्चर्य में सहमी हुयी सांझ
उतार लायी उसे ओढ़ाने को
पहले केसरिया फिर हल्का सफेद
फिर झीना नीला वह साफा
जो पहाड़ मफलर की तरह लपेटे
बादलॊं की मुड़ेर पर
हवा खा रहा था! !
उस सांझ के अद्भुत साफे से
थोड़ा केसरिया
धर लिया उसने अपनी मांग में
न जाने किस रहस्यमयी स्नेह बन्ध आगोश में ,
नीला रंग भर लिया अपनी आंखॊं में ,
रात जो रजत चन्द्रिका छीटेगी पहाड़ों पर
उसे देने के लिए ,
बाकी सफेद थोड़ा
लौटा दिया उसने सांझ को !
थॊड़ा बादलॊं को ! !

फिर भी ....
थिर नहीं हुय़ी हंसी की सरगम....
उसकी हंसी में तो नदी थी
बहती रही
उस दिन !


८ सितम्बर , २०१३