Monday, July 8, 2013

मिथक : थोड़ी बातचीत



(I)मिथक: मौजूद यथार्थ से एक अनुरूप (a model from existing reality)
पारम्परिक वेश में योद्धा
पारम्परिक नागा रसोईघर में


पिछले महीने कुछ कारणवश  नोकलाक जाना पड़ा । यह एक छोटा सा पहाड़ी गांव है जो म्यांमार के पास भारतीय सीमा पर स्थित है । मैं जहां रहता हूं  यहां से लगभग १६० किमी की यात्रा करनी थी , सीधा पूरब में । पहाड़ों की उंचाई और जंगलो का घनत्व लगातार बढ़ रहा था । मैं इस यात्रा को लेकर खासा उत्साहित था क्योंकि मैं नागालैण्ड के एक ऐसे हिस्से को देखने जा रहा था जहां के निवासियों द्वारा बहुत बाद तक “हेड हण्टिंग” जैसी प्रथायें व्यवहॄत की जाती रही हैं ।और एक “बाहरी” व्यक्ति के लिये यहां प्रवेश बहुत ही मुश्किल है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो  आज भी किसी प्रकार के वाह्य हस्तक्षेप से पूरी तरह अछूता है । नागा आदिवासियों की बहुत सी पारम्परिक प्रथायें जो अन्य क्षेत्रों में  इसाईयत व अन्य प्रभावों से धीरे धीरे खत्म हो रही हैं , यहां देखने को मिल सकती हैं.
 
एक व्यक्ति के घर जाना हुआ. चाय पीने के लिय हमें रसोयी घर में ले जाया गया, जहां पारम्परिक दो स्तरीय चूल्हे पर मांस के कुछ टुकड़े सूखने के लिये रखॆ गये थे. बांस निर्मित , अच्छी तरह  सजाये गये रसोय़ीघर की दीवारों  पर एक तरफ ढेर सारे , खाये जा चुके , बड़े जानवरों की खोपड़ियां छत से लगी हुयी टंगी हुयी थी. मैंने चाय पी. खाना नहीं खा   सका क्योंकि खा कर पहाड़ॊं पर यात्रा करना ठीक नहीं. खाने में चावल था, दाल टाईप की एक चीज थी जिसमें कुछ किसी चीज के पत्ते डाले गये थे.इसके अलावा एक दो उबली हुयी सब्जियां थी और मछली की चटनी थी. यह हमारे लिये विशेष तौर पर बनाया गया “वेज” खाना था. 

यहां पहुंचने के लिये एक कच्ची सड़क है जो सिर्फ कहने के लिये सड़क है  , इस गांव को सत्तर किमी दूर जिला मुख्यालय त्वेन्सांग से जोड़ती है ।यह क्षेत्र अप्रत्यक्ष रूप से  लगभग पूरी तरह से ”यूजी” के कब्जे में है । सीज फायर होने की वहज से सेना भी शान्ति से पड़ी रहती है. भारत सरकार का यहां सिर्फ एक बैंक है, एस बी आई और एक हेल्थ सेन्टर है. बाकी सड़क इत्यादि भी सब अण्डर ग्राउण्ड फैक्शन्स ने ही बनायी है.

इन सबके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात जिसने  मुझे नोकलाक के बारे में आश्चर्य से भर दिया  वह था वहां का अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य. एक अलग तरह का हरापन देखा मैंने ! अबूझ और मग्न जंगल उंचे पहाड़ॊं पर दरी की तरह लटके हुये थे. इन सब के बीच मुझॆ देखने थे वे तीन रहस्यमय़ी व जादूयी पहाड़ जिनके बारे में मैंने लोगॊं से बहुत कुछ सुन रखा था.
अपनी छोटी सी वैन में “जिग सा” सड़कॊं पर रात भर कबड्डी खेलते हुये हम शाम तक  त्वेन्सांग पहुचें ।रात वहीं छोड़ हम सुबह को साथ लिये नोकलाक के लिये निकल गये. पेड़ों के झुरमुट  और घने होते गये . ऊंचाई और बढ़ती गयी.

लगभग बीच में सैडल नामक स्थान आया जो कि दो हजार मीटर की ऊंचाई पर  होने के कारण अत्यन्त ठण्डा था. यहां के बाद सड़क लगभग खत्म ही हो गयी. अभी तीस किमी और जाना था. स्थानीय़ प्रशासकों , जिनकी भारतीय गणतन्त्र में आस्था बहुत कम है ,को अपना “पास’’ दिखाने के बाद हम नोकलाक के  लिये निकल पड़े.

नोकलाक में मुख्यतः खैम्यूंगन जाति  के लोग रहते हैं. ये वो जाति है जो सबसे बाद में इसाईयत के प्रभाव में आयी और पूरी तरह से “कन्वर्ट” होने से बची रही.   आज भी ये लोग दिन में जंगलों में नियमित शिकार के लिये जाते हैं. चिड़िया , छोटे मोटे जानवर इत्यादि जॊ भी मिलता है उसे मार कर लाते हैं. बड़े जानवर  खा कर खत्म कर दिये गये हैं. चिड़ियां भी बहुत कम बची हैं. सिर्फ कुछ मिथुन बचें है, वो भी बहुत कम. चूंकि खेती के नाम पर यहां ज्यादा कुछ नहीं होता, “झूम” खेती से थोड़ा बहुत चावल पैदा कर पाते हैं ये लोग, इसलिये जीविका के लिये जंगल पर इनकी निर्भरता बनी रहती है.  जानवरों के प्रति अपने हिंसक व्यवहार के अलावा खैम लोग बहुत शान्त प्रकृति के , प्रकृति प्रेमी, और कलाकार होते हैं. अपने पारम्परिक विश्वासों के अनुरूप ये लोग विभिन्न प्रकार की “दैवीयता” में विश्वास करते हैं । अन्य नागा आदिवासी जनजातियों से इतर इनके पारम्परिक समाज में “न्योकपाओ”( सेनापति), “पेच्ची” या “पुस्ती” (गांव बूढ़ा, शान्तिकर्ता) , “मेश्वो” (डाक्टर), “एन” (भविष्यवक्ता) , “पाउथाई” (कथा वाचक) के अलावा “मेया” या “अम्पाओ” भी होता था. मेया का मतलब सन्त है या साधु .

नोकलाक के बच्चों नें बताया था कि नोकलाक जाते समय गांव शुरू होने से पहले तीन ऊंचे  नुकीले पहाड़ों व्दारा एक त्रिभुजाकार आकृति जैसी बनती है आसमान के बिलकुल पास , उस तरफ नहीं देखना है.  देखने से ठीक नहीं होता है. क्योकिं उनके अनुसार , वह एक दैवीय स्थान है। उन तीन त्रिभुजॊं के बीच में एक बड़ा सा गोलाकार छिद्र है जहां से सारा ब्रह्माण्ड दिखता है। नोकलाक गांव के सभी अच्छे व्यक्ति मरने के बाद इसी पहाड़ पर रहने चले जाते हैं । जब गांव पर कोई विपत्ति आती है तो गांव-बूढा या प्रीस्ट पहाड़ों के पास  जाकर पूर्वजों से सहायता की मांग करता है. लेकिन, बढ़े बूढ़ॊं के अनुसार,  उन चोटियों पर कोई जिन्दा नहीं पहुंच सकता, और किसी को कोशिश भी नहीं करनी चाहिये क्योंकि यह पूर्वजों को अच्छा नहीं लगता. इसलिये सामान्य व्यक्ति को उधर देखना भी नहीं है.

इतना कुछ सुनने के बाद मैं जल्दी से जल्दी न देखने के लिये उन पहाड़ों को देखना चाहता था. बार बार मैं खिड़की से बाहर देख रहा था. अन्ततः मेरा इन्तजार खत्म हुआ. अपनी सीट का दाया शीशा मैंने खिसकाया और ठण्डी हवा अन्दर आने दी. उस तरफ उस गहरी घाटी के उस पार तीन नुकीली त्रिभुजाकार चोटियां उत्तुंग खड़ी थी. मुझॆ अपनी गरदन लगभग एक सौ साठ डिग्री पर उठानी पड़ी. तब जाकर मेरा दृष्टि-फलक उन उत्तुंग मिथकीय़ शिखरों को छू सका. वे पहाड़ सीधे खड़े थे. एकदम सीधे. उनपर जंगल ऐसे लटका हुआ था जैसे कोई हरी दरी लटका दी गयी हो दीवार के सहारे.
देखकर ही समझ आ गया कि इन पहाड़ॊं पर सामान्य तौर पर नहीं चढ़ा जा सकता. जिसनें भी शिकार इत्यादि के चक्कर में इन तल्लीन चोटियों को परेशान करने की कोशिश की होगी वह जान से गया होगा, कभी लौट कर नहीं आया होगा। बहरहाल , यह मेरी संकल्पना भर था। गांव में पहुंच कर थोड़ी बहुत खोजबीन की तो पता चला मैं लगभग सही ही था. 

गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के डक्टर से मिलना हुआ. उन्होंने बताया कि नोकलाक से उन पहाड़ियों तक पहुंचना बहुत ही दुष्कर है। नोकलाक भी एक चोटी पर ही स्थित है जो कि उन त्रिभुजाकार चोटियों के समान्तर सीधी खड़ी हैं । दोनों के बीच में एक नदी भी बहती है. चूंकि खैम जनजाति के लोग अपनी परम्परा के अनुसार आसपास दिख रहे सबसे उंचे पहाड़  पर रहना चाहते हैं इसलिये कुछ लोग बीच बीच में उन चोटियों पर चढ़ने की कोशिश करते रहे हैं । हर बार ही वे असफल हुये हैं । दुर्घटनाएं हुयी हैं । 

हालांकि अब ऐसा बहुत कम या नहीं हो होता है क्योंकि बड़े-बूढ़ों ने सबको बता दिया है कि
ये चोटियां दैवीय हैं ।
इन पर जिन्दा नहीं जाया जा सकता। यहां मरने के बाद जाया जाता है।
इनकी तरफ देखना भी नहीं । (क्योंकि देकने से जाने का मन करत है)।
यहां से ब्रह्माण्ड दिखता है ।

और इस तरह रच दिया जाता है एक मिथक.





मिथक क्या है : एक डिस्कोर्स-

हिन्दी का “मिथक” शब्द अंग्रेजी के “मिथ” का ही भाई बन्धु है. अंग्रेजी का ”मिथ”  ग्रीक शब्द “Mythos” से निर्गत प्रतीत होता है. लैटिन में एक शब्द है “Mythus”. उसके भी अर्थ लगभग वही हैं जो Mythos के हैं. लेकिन अंग्रेजी भाषा की जबान पर चढ़ने से पहले संभवतः यह शब्द फ्रेंच भाषा में Mythe के रूप में प्रयोग में आया, लगभग १८१८ में . [see britannica encyclopaedia] . कुल मिलाकर इस शब्द की  उत्तपत्ति के बारे में कोई निश्चित व अन्तिम जानकारी नहीं है. 

ग्रीक भाषा में मिथोस का शाब्दिक अर्थ है कोई कथा या कथानक; सत्य अथवा काल्पनिक. इसी क्रम में बहुत सी कथाओं की एक श्रृंखला में किसी एक कथा को “मिथ”  कहा जाता है.  “बहुत सी कथाओं की श्रृंखला” को Mythology कहा जाता है. माईथालजी कुछ उन प्राचीन व एक प्रकार के स्रोत से उद्भूत व पोषित कहानियों का एक ऐसा निकाय होती है जो एक निश्चित समुदाय द्वारा इसलिये मौखिक अथवा लिखित रूप में संरक्षित की जाती है ताकि वह समुदाय अपने पराभौतिक मतों , विश्वासों व आध्यात्मिक अनुभवों के परिपेक्ष्य में इस संसार के उद्भव, इसकी गतिशीलता तथा इसके अन्त की व्याख्या कर सके।  इस संसार में मानवीयता द्वारा झेली जाने वाली समस्यायें --“Human Conditions”, उनके हल तथा व्यक्ति को कैसे जीवन जीना चाहिये , इससे सम्बन्धित नियम ....या यूं कहें कि “codifications’’......माईथालजी द्वारा प्रतिपादित किये जाते हैं.

इसलिये ही ज्यादातर मिथ सामाजिक या धार्मिक कर्मकाण्डों से जुड़े रहते हैं. लेकिन नृतत्वशात्रियों में इस बात पर विभॆद है कि कर्मकाण्डों से मिथ संचालित/उद्भूत होते हैं या मिथकों से कर्मकाण्ड । मेरा मानना है कि कभी मिथकों से कर्मकाण्ड रूपायित होते हैं तो  कभी कर्मकाण्डों के अतिशयोक्तिपूर्ण महिमा मण्डन से मिथकों का पोषण होता है. दोनों प्रक्रियायें समान्तर अविरल चलती रहती हैं . यह एक जटिल अन्तर्क्रिया है . मुझे लगता है कि यहां लगभग वही मामला है जो शोध या अध्ययन की Inductive , Deductive विधियों में होता है. कभी हम अनुभव से नियम की तरफ बढ़ते हैं तो कभी नियम से अनुभव की तरफ गति होती है.

वीर गाथाओं, लोक कथाओं व मिथकों में थोड़ा अन्तर होता है. सबसे बड़ा अन्तर ये है कि वीर गाथाओं में मुख्य पात्र --नायक -–मानवीय होता है जबकि मिथकों में नायक दैवीय व धनात्मक या ऋणात्मक रूप में धार्मिक होता है. वीरगाथाओं , लोककथाओं में नायक , पात्र पारलौकिक शक्तियों , गुणों से ओत प्रोत हो सकता है किन्तु वह आवश्यक तौर पर धार्मिक नहीं होता . मिथक के सन्दर्भ में ऐसा नहीं है. 

यहां एक ध्यान देने योग्य बात और है. पश्चिमी चिन्तन व मापदण्डों के अनुसार मिथक वही है जिसमें हीरो जरूरी तौर पर भगवान या भगवान स्वरूप हो. अच्छाई या नैतिक मूल्यों का स्रोत हो. किन्तु पूरबी दार्शनिक –धार्मिक-सामाजिक चिन्तन परंपरा में ऐसे मिथक भी रचे गये हैं जो वे सभी कार्य बड़ी निपुणता से करते हैं जो सीधे तौर पर “धार्मिकता” के खांचे में नहीं आता. अतः धार्मिक तौर पर “ऋणात्मक” होने पर भी किसी मिथक की मिथकीयता पर कोई फर्क नहीं पड़ता.
“मिथक” संप्रत्यय के विकास क्रम में दो बातें और ध्यातव्य हैं . पहली और छोटी सी बात ये है कि लगभग १८३०-४० के बाद से “मिथक” शब्द के अर्थ में परिवर्तन आया. डार्विन उद्वेलित विकासवाद , औद्योगिकीकरण इत्यादि घटनाओं के परिपेक्ष्य में हमारा दिमाग ज्यादा तार्किक हो गया. उससे पहले तक मिथक शब्द एक सकारात्मक अर्थ लिये हुये था. लेकिन शनैः शनैः मिथक अर्थात असत्य या तथ्यरहित , ऐसा अर्थ इस शब्द से जुड़ गया. हमारे आज के आम बोलचाल एवं सोच समझ में लगभग यही अर्थ रचा बसा है.
दूसरी बात यह है कि १९६८ के आसपास फ्रेंच संरचनावादी क्लाड लेवी स्ट्रास ने मिथ को एक बिलकुल अलग स्तर पर परिभाषित किया. पारम्परिक मतों से इतर स्ट्रास ने मिथक को “संकेतों” का वह निकाय बताया जिसका कोई एक निश्चित व वास्तविक अर्थ उसके प्रतिपादकों द्वारा नियत न किया गया हो. उन्होंने मिथक को संस्कृति विशेष के संदर्भ में समझने पर बल दिया और कहा कि मिथक प्रतीकों का एक सुव्यवस्थित समूह है जिसे फर्डिनेण्ड डी शसुर के “Linguistic theory” के माडल पर समझा व व्याख्यायित किया जाना चाहिये. [see: “The structural study of Myth” in Structural Anthropolgy].

जादूयी पहाड़
फर्डिनेण्ड डी शसुर के भाषावैज्ञानिक सिद्धान्त का सारांश जो यहां महत्वपूर्ण है, यह है कि भाषा प्रतीकों का एक निकाय है । हर प्रतीक “सिग्निफायर” है और प्रतीक द्वारा प्रतिपादित अर्थ “सिग्निफाइड” है . शसुर का मानना है कि “सिग्निफायर” व “सिग्निफाइड” में कोई वैज्ञानिक सम्बन्ध न होकर एक व्यवहारजन्य “यादृच्छिक सम्बन्ध” है । ध्यान दें,  “यादृच्छिक सम्बन्ध” है । स्ट्रास ने यही पाराडाईम उठा कर मिथक पर लगा दिया. और कहा कि मिथक कुछ निश्चित व अनन्य कथाओं का समूह नहीं है . यह एक “रचना” (“Work”) है जो कि अभी भी लगातार रची जा रही है व अहर्निश परिवर्तनशील है. यह लिखित व मौखिक व्याख्यानॊं में अभिव्यक्त होती है और उन विभिन्न मार्गों / तरीकों को स्वयं में आत्मसात करती है जिनके द्वारा यह ग्रहीत व विनियोजित होती है. इसके साथ ही स्ट्रास ने भाषा की संरचना में मार्फ , मार्फीम व अलोमार्फ की तर्ज पर मिथक को भी “मिथीम” (Mytheme) के स्तर तक विश्लेषित किया.   मिथीम किसी मिथक का वह केन्द्रिय संरचनात्मक अणु होता है जिसके आसपास मिथक रचा जाता है. इसमें  कथात्मकता , धार्मिकता व नैतिकता के मूलभूत गुण विद्यमान होते हैं.

इसके अलावा , अगर हम धर्म-दर्शन (Religious Philosophy) के चश्में से देखें तो हम कह सकते हैं कि (अपने पारंपरिक अर्थों में ) “मिथक” धर्म के विकास के बहुत प्राथमिक चरण हैं. ज्यों ज्यों मनुष्य की तार्किकता बढती गयी त्यों त्यों मिथक के प्रकार्य परिमार्जित व परिवर्तित होते रहे. ज्ञान  व सभ्यता के विकास के साथ जब मनुष्य की सामूहिक आध्यात्मिक चेतना ने अपने विकास की यात्रा में चैतन्यता के नये आकाश खोजे तब मिथक सामान्य चेतना के सामान्य जन व्यवहार का एक हिस्सा बन कर कर्मकाण्डॊं में जीवित रहा. साथ ही साथ यह कवियों का भी बहुत प्रिय हो गया. कालरिज ने कहा “ Still doth the old instinct bring back into the old names.” जर्मन स्वच्छन्दतावादी लेखक आर. डब्ल्यू. जे . श्चिलिंग और फ्रेडरिक शेगेल ने यह तक कहा कि हर महान लेखक को अपनी माईथालजी विकसित करनी चाहिये जो हमारी ऐतिहासिक मिथकीय अन्तर्दृष्टियों एवं नयी दार्शनिक, वैज्ञानिक खोजॊं को समंजित करते हुये एक नयी जीवन दृष्टि पैदा करे. विलियम ब्लेक ने अनुभव किया कि ’मुझे अपनी स्वयं की मिथकीय व्यवस्था रचनी होगी अन्यथा मैं दूसरे द्वारा रची गयी व्यवस्था का गुलाम बना लिया जाऊंगा.’

जोसफ कैम्बेल ,जिन्होंने “मिथक” पर बहुत गुणवत्तापरक शोध किया  , बताया कि मिथक हमारे लिये क्यों जरूरी है ! मिथक का प्रकार्य बताते हुये उन्होंने यह दो तीन ज्ञानबिम्ब सामने रखे , ये  हमारी पूरी बातचीत का सारांश हो सकते हैं—
1. इस ब्रह्माण्ड के रहस्य से विस्मयाभिभूत मनुष्यता को इस रहस्य को झेलने /समझने में मदद करना / सहारा देना.
2.मनुष्यता को अपना एक “विश्व-विज्ञान” (Cosmology) रचने में मदद करना ताकि वह ब्रह्माण्ड के गूढ़ रहस्य को बिना डरे हुये समझ सके.
3.     मिथक द्वारा वर्तमान सामाजिक व्यवस्था का समर्थन होता है व मिथक व्यक्ति की वैयक्तिकता को संघटित रूप से उसके समूह की सामूहिकता से जोड़ने में मदद करता है .
4.     मिथक व्यक्ति को उसकी स्वयं की आध्यात्मिक मनोभूमि में सत्य की खोज के कार्यक्रम में दीक्षित करता है एवं इस पथ पर उसका मार्ग निर्देशन करता है. 

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नोट: प्रथम भाग मेरी डायरी के कुछ पन्ने हैं , मैलिक हैं.
द्वितिय भाग में मेरे संगी शेर खान रूमी के साथ हुयी मेरी बातचीत का बहुत योगदान हैं. कुछ पंक्तियां सीधे तौर पर अंग्रेजी परिभाषाओं का सन्दर्भ के अनुसार अनुवाद हैं. लेकिन कुछ ही.



Works consulted:

Douglas Vincent Bush, Mythology and the Renaissance Tradition in English Poetry (rev. ed.,
1963) and Mythology and the Romantic Tradition in English Poetry (rev. ed.,
1969).
Among studies of myths especially influential for modern literature and criticism are James G. Frazer, The Golden Bough (rev., 1911);
Jessie L. Weston, From Ritual to Romance (1920);
Jane E. Harrison, Themis (2d ed., 1927);
F. R. R. S. Raglan, The Hero (1936).
On myth criticism, see William Righter, Myth and Literature (1975);
Francis Fergusson, The Idea of a Theater (1949);
Richard Chase, Quest for Myth (1949);
Philip Wheelwright, The Burning Fountain (1954);
Leslie Fiedler, Love and Death in the American Novel (1960);
John B. Vickery, ed., Mythand Literature (1966);
Northrop Frye, Anatomy of Criticism (1957) and
"Literature and Myth" in Relations of Literary Study, ed. James Thorpe (1967).