Sunday, June 23, 2013

सोच (२)



सब कुछ स्वयं में ही विरोधाभासी है । जो है, उसी में उसका विरोध है , विपरीत है । सच में झूठ है, झूठ में सच है , मौत में जीवन है , जीवन में मौत है, जो अच्छा है , वही क्षण के एक बिन्दु के बाद बुरा है , बुरा है वही स्थान की एक अलग विमा में अच्छा है !
और सबसे रहस्यमय हैं इन विपरीतताओं के संधिस्थल , वे गूढ क्षितिज , जहां सच झूठ से मिलता है , मौत जीवन से मिलती है , जीवन मौत से मिलता है और गहन संवेदना विषण्ण हिंसा से मिलती है !