Saturday, December 22, 2012

काल-पुरुष मौन होगा !


त्रास !

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मूल्य , अस्मिता और संवेदनायें

वर्षों पहले पुते चूने की पपड़ी-से
झरते दिखते होंगे तुम्हे

हास्पीटल के उस कमरे में

जहां तुम्हारी क्लान्त आत्मा

अपनी क्षत-विक्षत देह की गुदड़ी

लपेटे

समय के वेन्टिलेटर पर पड़ी होगी !

 

तुम्हारी भीगी सूखी
 
बन्द पलकों के अन्धियारों में

भटकते होगें वो कई अनाथ निश्छल प्रश्न

जो तुम्हारी आत्मा ने गीली आर्त ध्वनि में

पूछा होगा काल पुरुष से !

और वह मुंह फेर चुप रहा होगा !

चुप रहा होगा इस बात पर कि

तुम्हारे इस छोटे से हिस्से में उगा , फैला

आदमी का यह बसाव  

परिमार्जन और विकास की इतनी कबड्डियों के बाद भी

इतना विषण्ण ! इतना हीन ! कैसे ?? !!!

 

धर्म , दर्शन , विज्ञान और तकनीक की

संलग्न अनुशंसायें लिये फिरता यह जीव

भौतिकी से परा भौतिकी की सुर्तियां चुभलाता यह जीव

इतना कुत्सित ! इतना जघन्य ! कैसे ?? ! !

 

त्रास !

 

काल-पुरुष मौन होगा ! अनुत्तरित !