Sunday, October 10, 2010

रीडर रिस्पान्स थियरी पर........

चट्टानें बोलती हैं ।

(इसमें अर्थ न खोजें
यह कविता नहीं है । )

जो गढ़ी गयीं
मूर्ति बन गयीं
मन्दिर में सज गयीं
वे भी .

जो तोड़ी गयीं
कंकड़ बन गयीं
सड़कों पर बिछ गयीं
वे भी.  

चट्टानें बोलती हैं ।

(इसमें अर्थ न खोजें
यह कविता नहीं है । )

जो गढ़ी गयीं
मन्दिर में सज गयी
वे पद्य में बोलती हैं
भक्त से बात करती हैं ।

जो तोड़ी गयीं
कंकड़ बन गयीं
वे गद्य व सूत्र में बोलती हैं
जियोलाजिस्ट से बात करती हैं ।

तो
चट्टानें ,
हालांकि बोलती हैं
लेकिन इसमें अर्थ न खोजें
यह  कविता नहीं है !