Sunday, March 14, 2010

दिनों बाद .........


चलूं

आज दिनॊं बाद

लिखूं कुछ !

कॊई कविता !

हेरूं

मन को

पुरूं

गेहूं के टूण –सी

छोटी

गैरजरूरी

बातों के

टूटॆ धागे !

शब्दों को धोऊं,

पॊछूं

बांधू उनकॊ

धागे में

भावॊं के जुलहे की पूंछ में

टांकू उसे

छोड़ू उसे

भागे वह

द्वारे द्वारे

फूले फूले

नदी किनारे

तीरे तीरे

दौड़ू मैं भी

पीछे पीछे ! !

आज दिनों बाद !