Wednesday, December 22, 2010

जाड़ !

किसी अन्जान,अर्थहीन
दुख के आगोश में
खामोश हरे पेड़ो ने
छोड़ दिया 
अपने अन्तर की उष्मा को
संचित रखने का 
अन्तिम आग्रह !

शाम की जर्द पीली धूप ने
सूरज के चाहते हुये भी
पेड़ो को देने के लिये
कुछ गर्म सपनों की खातिर
किसी पुराने मकान के
मटमैले जर्जर छ्ज्जे पर
खुद को निचोड़ दिया
एकदम अन्दर तक------अन्तिम तह तक !
लेकिन……………..s..s..s..s…s
झरा कुछ भी नहीं सिवाय
दो बूंद ठण्डे
अपदार्थ , अभौतिक , पीलेपन के !

छज्जे पर बैठी गौरैया
बिना चूं चूं किये उड़ गयी
दरार में उगा हिजड़ा पीपल  हिलने लगा !
और वर्षों पहले पेन्ट की हुयी
खदरती खिड़की की कुण्डी खॊल
घर में अकेले रहने वाले बुढ्ढे ने
छज्जे पर पिच्च से थूक दी सुर्ती !

धूप
पीलेपन
पीपल
और बुढ्ढे -----
सबसे सर्वथा मुक्त ,
आग्रहहीन एवं 
हर दृष्टिकोण से सरलीकृत
पेड़ॊ की हर डाल
हर पात पर
उतर आयी 
जाड़----
ठंडी 
सफेद 
शुष्क !


Wednesday, December 15, 2010

ज्वार

ज्वार आया
और चला गया !

तुम्हारे कुछ
शब्दों के साथ
किनारे रेत में
अटका रह गया मैं !

धूल धूसरित
पहचानहीन
चुप !  

Saturday, December 4, 2010

बनारस के ब्लागर्स ...

अरविन्द जी के घर पर आज शाम को बनारस में एक छोटी सी ब्लागर्स मीट . फॊटो में एम वर्मा , आन्टी जी,  उत्तमा दीक्षित , मैं , देवेन्द्र पाण्डेय , अरविन्द मिश्र , बनारसी जी . (बायें से दायें) 









आओ ! बैठो !
चलो , कुछ बातें करें !
बोले , बतियायें !
कुछ सुनें , सुनायें !
कथायें तुम्हारी
कुछ व्यथायें हमारी
गीत कुछ अनकहे
कुछ सपने पुराने !

बैठो ,आराम से पैर करके ऊपर !
कुछ सोचते हुये चाय पीते रहो .
दिल में तुम्हारे इक किताब छोड़कर
कई शब्द  जो बहुत पहले ही तुमसे
रूठ कर झर गये अकेले आंख की कोर से
बुलाओ उन्हें मनाओ उन्हें
हमने मिलकर बनाया है इक छन्द प्यार का ,
इसी में पिरोऒ उन्हें , सजाओ उन्हें !


Wednesday, November 24, 2010

अरे प्यारे भगवान जी !

(जीवन , मृत्यु , प्रेम , संवेदनाएं , विचार इत्यादि ही कविता की मुख्य विषयवस्तु क्यों हॊ ? क्या ठोस  वैज्ञानिक तथ्य व प्रक्रियायें कविता का विषय नहीं हो सकती ? मेरा मन कहता है क्यॊं नहीं हो सकती ? तो परिणाम स्वरूप यह कविता -----)


अरे प्यारे भगवान जी !
कहां से किया तुमने बी. टॆक.
और की
टेक्नालाजी की इतनी पढ़ाई
कि बना सके
यह  जबरदस्त पृथ्वी !!!


मैं तो हैरान हूं
मैं तो परेशान हूं
छत पर खड़े हो कर देखता हूं आसमान
देखता हूं-- स्ट्रेटॊस्फीयर , मेजोस्फीयर , आयनोस्फीयर ,
देखता हूं यह संख्याओं की औकात नापता अनन्तः विस्तार ।



मन भुनभुनाता है अपने आप में ही सोचकर
तुम्हारी यह
हजारों विचित्र व महीन अनवरत प्रक्रियाओं को
चुपचाप इतनी सरलता से
निष्प्रयास अन्जाम देती
केमिस्ट्री !


सतह से पन्द्रह किलोमीटर ही ऊपर
क्षोभमण्डल में तापमान का इतना घटाव ,
यह माइनस सिक्स्टी डिग्री का टेम्परेचर !!!
फिर पचास किलोमीटर ऊपर समताप मण्डल में
ऋण पांच से पांच डिग्री का बढ़ाव ! ! !
फिर इसी तरह अस्सी किलोमीटर पर
ऋण एक सौ दस डिग्रीसेन्टीग्रेट
और चार सौ किलोमीटर यानी आयनोस्फीयर के
उपरी भाग में
धड़ाम से एक हजार डिग्री सेन्टीग्रेट ! ! !


क्या बात है !
विचित्र बात है !
सोचता हूं पगलाता हूं !




यह ठीक है कि
समताप मण्डल में
ओजोन गैस के गलियारे हैं
और सोखकर पराबैगनी विकिरण
ओजोन बढ़ा देती है ताप यहां !! !


यह भी ठीक है कि
आयनन मण्डल में
यही थेथर पराबैगनी किरणें
बेचारे परमाणुओं के सर फोड़ फोड़
कर देती हैं उन्हें आयनित
और इन उष्माक्षेपी अभिक्रियाओं से
निकली उष्मा से
बौरा जाता है आयननमण्डल ! ! !



लेकिन
मेरे प्यारे भगवान जी ! !
ये इतना जबरदस्त अरेन्जमेंट
हुआ कैसे आपसे
कि एक पूरी बड़ी सी लैब ही
फैला डाली इस बेचारी
आज्ञाकारी   पृथ्वी के आसपास ! ! !




जरा कहो तो !
कुछ बताओ तो !


ट्रेड क्या था तुम्हारा ? ? ?
आयनोस्फीयर की व्यवस्था देखकर तो यही लगता है
कि जरूर तुम
ईसी  ब्रान्च से रहे होगे !
नहीं तो कैसे बांटते तुम इस पूरे मण्डल को
डी , ई वन , ई टू , एफ वन ,एफ टू एवं जी परतों में !
कैसे तुम निर्धारित करते कि
डी रिफ्लेक्ट करेगा लांग रेडियेशन वेव्स
ई वन , ई टू मिडियम रेडियेशन वेव्स
एफ वन ,एफ टू शार्ट रेडियेशन वेव्स
व जी बचा खुचा सब !



यह इतना कठिन निर्धारण ?
हर तरंग के लिये अलग अलग ?
हमने तो सोचा था कि
हम सबके लिये
बस यह एक चुल्ली सा मन
और उसमें उछलने वाली
कुछ टिड्डी जैसी भावनाएं बनाकर
इन्हें  उलझे रहने के लिये
कुछ किताबें व
दो चम्मच प्यार देकर
तुम सेफ मॊड में पड़े
आराम कर रहे होगे !




लेकिन नहीं
श्योर हूं मैं
कि खूब मन से की है तुमने
तकनीकी और विज्ञान   की
जबरदस्त पढ़ायी
व चिति के लास्य से निःसृत
इस विशद प्रकृति के
समस्त प्राकृतिक संसाधनों ,
इसके जीवनदायी, निर्व्याज सौन्दर्यभूषित
शस्य श्यामल , हेम आप्लावित
उत्तुंग गिरि शिखर , कन्दरा , गर्त
गुह्य गह्वर
तथा मूर्तिमान रहस्य , इस
गूढ़, असीम , शून्य व्योम के
प्रत्येक सौष्ठव , प्रत्येक सौन्दर्य
व प्रत्येक रहस्य के पीछॆ
खूब ठीक से रचा है
पूरी तरह समझा जा सकने वाला
एक निश्चित व निर्धारित पैटर्न !

Sunday, October 10, 2010

रीडर रिस्पान्स थियरी पर........

चट्टानें बोलती हैं ।

(इसमें अर्थ न खोजें
यह कविता नहीं है । )

जो गढ़ी गयीं
मूर्ति बन गयीं
मन्दिर में सज गयीं
वे भी .

जो तोड़ी गयीं
कंकड़ बन गयीं
सड़कों पर बिछ गयीं
वे भी.  

चट्टानें बोलती हैं ।

(इसमें अर्थ न खोजें
यह कविता नहीं है । )

जो गढ़ी गयीं
मन्दिर में सज गयी
वे पद्य में बोलती हैं
भक्त से बात करती हैं ।

जो तोड़ी गयीं
कंकड़ बन गयीं
वे गद्य व सूत्र में बोलती हैं
जियोलाजिस्ट से बात करती हैं ।

तो
चट्टानें ,
हालांकि बोलती हैं
लेकिन इसमें अर्थ न खोजें
यह  कविता नहीं है !

Wednesday, October 6, 2010

थोड़ी देर ....

चलो . . . ! ! !
थोड़ी देर . . .
साथ रहें !

एक दूसरे को फोन करें
 और...
 हैलो भी ना बोलें ।

बहुत देर तक
चुप रहें . . .

और बिना  कुछ कहे
हल्की सी सांस छोड़
फोन रख दें ।

इतनी दूर होकर भी
चलो . . .! ! !
 थोड़ी देर
साथ रहें !

Thursday, September 30, 2010

खाली समय में

राम !
तुम घबराना नहीं,
तनिक भी डरना नहीं !
तुम्हारी नियति का फैसला
एकदम संवैधानिक होगा  !
सब कुछ
साक्ष्य और धाराओं के
सटीक सहयोग से उपजेगा !
तब तक
राम !
तुम बैठ कर
थोड़ा आराम करो !
खाली समय में कुछ किताबें पढ़ो ,
बाल्मीकी रामायण ,
उपनिषद इत्यादि तो होगें नहीं पास तुम्हारे,
रामचरितमानस के ही
कुछ पन्ने पलटॊ ,
कुछ गुनगुनाओ
एकदम मत डरो !
\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\

मोहम्मद !
 तुम भी मेरी बात मानो ,
चिन्ता एकदम न करो !
असुरक्षित प्रशासनिक राजनैतिक संबन्धों से
जरूर मेरे इस देश की देह पर दिखने लगे हैं
एड्स के कुछ लक्षण
लेकिन तुम निश्चिन्त रहो
कोर्ट पर विश्वास रखो
क्योंकि
कोर्ट को नहीं बनानी है फिर से सरकार
और कोर्ट की अलमारी में सौभाग्यवश
नहीं रखा है कोई भी धर्मग्रन्थ !!!

तो तुम भी
रेहल की गर्द पोछो
और कुरान खॊलकर
कुछ पन्ने पलटो!
जरा देखो कि
सब अर्थ सब व्याख्याएं
ठीक ठाक हैं न !

Friday, September 24, 2010

प्रतिध्वनि !

तुम्हारी आवाज
छोटे छॊटे
अलग अलग
असंबद्ध टुकड़ों में
बहुत देर तक
गिरती रही
मेरे भीतर के किसी
गहरे

और गहरे

कुएं में

हां कुएं  में  !




सनसनाती हुयी

तेजी से

नीचे

और नीचे
बढ़ती

तुममें आयी बदलाहट का अर्थ लिये
मरे शब्दॊं की शिराओं में दौड़ती
जिन्दा आवाजें

अपने पीछे
कुछ हल्की फीकी पड़ती
आवाजों का एक धुआं -सा छोड़ती

अन्ततः उस गहरे कुएं में
बहुत अन्दर तक गयी !

लेकिन वहां
सन्नाटा
जमें हुये लावा की तरह
इतना अधिक और गाढ़ा था
कि
शायद
दम घुट गया उनका !

क्योंकि शून्य मन
जोहता हूं बहुत देर से
अभी तक नहीं आयी
कोई प्रतिध्वनि !

Sunday, September 19, 2010

वेश्यावृत्ति


जीवन तो
जाने कब का
चुक गया था


फिर
वहां

मौत
थी

वही मौत

॒॒॒॒॒॒॒

जाने क्यॊं

चीजें
पैदा हुयी थी

जाने क्यों
चीजें
खत्म
हो गयी


फिर
वहां

मौत
थी


वही
मौत


॒॒॒॒॒॒॒

सब
फूल झर गये

पंछी
सब मर गये
वृन्त
सब पीत हुये

शब्दॊं
में भर गयी सड़ान्ध

उत्सव
की स्मृतियों में लग गये दीमक
मर
कर सड़ गया

प्यार

देह
को उसकी

नोच
कर कौवे

खा
गये


फिर
वहां

मौत
थी


वही
मौत

॒॒॒॒॒॒॒

समय
ने खॊले

फिर
जाने
कितने
नये
चकलाघर

धुंआधार
चलने लगी

फिर
वही

हां वही
जीवन
की अबाध
वेश्यावृत्ति

Wednesday, September 15, 2010

कविता और बुढ़िया


इस चक्कर में
कि किसी दिन
एक ही बार
लिखूंगा कोई खूब अच्छी सी
जबरदस्त कविता
मैंने नहीं लिखने दी
खुद को
अनेक छोटी छोटी
अ- अच्छी कविताएं!!!!!

इस तरह अनेक भाव उमगे
और नष्ट हो गये !
मैं ,अमानुष ! पाखण्डी !
देखता रहा चुपचाप
इन भ्रूण हत्याओं को
यह सोच कर कि
भावों , संवेदना-वृत्तों का भी
होता है पुर्नजन्म
और अभिव्यक्ति की स्पृहा को त्याग
जब मन में दम तोड़ता है कोई अनभिव्यक्त भाव
तो नष्ट होने के बजाय वह प्रवृत्त होता है
अपने परिष्कृत विकास के नये आयाम में !!!!

इसलिये ही
हर शाम
मैं सड़क नहीं
गली वाले रास्ते से
पैदल ही जाता रहा अस्सी घाट
क्योंकि गली के मुहाने वाली लकड़ी की गुमटी में
कोई चाय पान की दुकान नहीं
बल्कि रहती है
चार पांच बरसात झेल चुकी
बगईचा अगोरने के लिए लगाई गयी
पुआल की मढ़ई-सी जर्जर बुढि़या !

चूंकि बुढि़या जीवित है !
और जिन्दा रहने पर खाने को कुछ चाहिये
सो बुढ़िया रोज शाम को
चार फुट की गुमटी के ठीक बाहर
(सौभाग्यवश) आठ फुट की इस व्यस्त गली में
अपने छोटे से हड़प्पा की खुदाई में प्राप्त हुये स्टॊव
पर रोटियां पकाती है !
बाहर ही , शाम को भी, नहाती है ,
फिर खुद को
और कुछ अधूरे स्वप्नों सी
उन पकी अधपकी रोटियों को लेकर
वापस अपनी गुमटी में लौट जाती है ,
शायद इस दुनियां से बहुत दूर !

मैं बगल में ,
किसी दुकान पर बैठा
यह सब देखता हूं
और बस देखता हूं !
कुछ सोचता नहीं हूं
हर रोज बस थोड़ा और
आक्रान्त व
कुण्ठित होता हूं !

अनेक भाव उफनते हैं
उमगते हैं
कई नपुंसक आक्रोश व
कुष्ठ रोगी संवेदनाएं
जिनसे बड़ी अच्छी कविता बन सकती है ,
कविता बन जाने को
चिचियाते , घिघियाते हैं
लेकिन
कलम खुट्ट खुट्ट करता , टॆबल पर चुपचाप
बहुत देर तक
मैं कुछ सोचता बैठा रहता हूं
तब तक
न जाने कब
पन्नों की पक्तियों में
उभर आती हैं
साईकिल के हवा निकले ट्य़ुब जैसे
रोटी बेलते हाथों की झुरियां
और मैं चुपचाप
बिना कुछ लिखे
कापी बन्द कर उठ जाता हूं !

Sunday, July 4, 2010

वैजयंती

कहॊ !
राग की यह वैजयन्ती
तुम कहां से लहा लाये ?

सजाये पलाश-पल्लव , गूंथ माला, फेर दी
नेह विजड़ित मन मेरा , बन मुर्तिका , सज गया !

दूर हो मुझसे , बना चन्दन , घिसा मुझको
फिर मुझी पर पोत सारा , चन्दन गन्ध मादल कर दिया !

दी थाल वेदना की ,सजाने को आंसुओं के मौन दीप
फिर फेर एक दुलार पूरित करूणार्द्र दृष्टि, ज्योतित सभी को कर दिया !


थे विशद विप्लव , संवेग-वात्याचक्र-प्रकम्पित सत्व
गहन आह्लाद में बोर तुमनें, अखण्ड - प्रशान्ति - यज्ञ ॠत्विक बना दिया !

कहो !
इस घने अवसाद में यह
जड़ी बूटी कहां पाये ?
राग की यह वैजयन्ती
तुम कहां से लहा लाये ?

Saturday, June 12, 2010

फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !


सोचा था

चलेगें सिन्धु की थाह लेने

नीली अतल गहराइयों की

स्वयं पर एक छाप लेने ।



था स्वप्न चलेंगे एक बार

निरखने विशद अनुभूतियॊं के

गहन कानन लता कुंज गह्वर ,

चुनेगें कुछ पुष्प

चेतना की सजावट को

संघनित आर्द्र भाव अवगुंठनों के।



अजाने मन की

हुलसती एक चाहना थी

उड़ेगें हम भी संवेदना के प्रसार में ,

बतियायेगें

व्योम के निस्तब्ध वितान से

गहन मौन की बातें ।



वृन्त पर जो पुष्प है चुप समर्पित

उससे भी मिलेगें जानने को उसका समर्पण

अपने निविड़ एकान्त में वह किस तरह

देता है स्वयं को , अवसन्न , अशेष

अम्बर की निस्सीम विशालता को ?



सांझ की नीलम पट्टिका ओढ़

सुदूर बहुत सलिल तीरे ,स्तब्ध

सो रही है जो हरे गाछों की घनी बस्ती

जिन पर चांद से चुरायी चन्द्रिका को

बना अच्छत छींटते हैं प्रकाश कीट

विशाल वृक्ष जिनमें , अर्द्ध-मुखरित , स्तिमित

कर रहें हैं श्रेयस सांध्य गीत मौन वाचन

मौन ही की धुन पर , लयमयी , सुरमयी

सोचा था

सुनेगें

गुनेगें उन्हें भी ।



किन्तु

नियति तो यह थी नहीं ।


फिर लौट आये हैं

चेतना के हंस कछारों से ही ।

गहनता

फिर एक स्वप्न बन कर रह गयी है ।

गये थे थाह लेने अतल गहराइयों की

लेकिन

ठगा है खुद ही ने खुद को,

फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !

कविता के विरोध में

भाव पंचर हो गये हैं !



मन न जाने क्यों

अपना मसौदा

कविता को देना नहीं चाहता

है बहुत कुछ पास उसके

कहने को , सुनाने को

कविता को देने को

कविता हो जाने को

लेकिन वह दबाये बैठा है

सटकाये बैठा है ! ! !


वह नाराज है शायद कविता से

कि वह बड़ी डिप्लोमेट हो गयी है !

मन के मसौदों को नीलाम कर रही है !

सभी विधायक दबावों को

फिस्स कर दे रही है

सभी सृजनात्मक बलॊं को बिखेर दे रही है !

Saturday, May 29, 2010

निःशब्द


चलती हवा में

झूमते पेड़ की खुशी का गीत

मुझॆ पढ़ने नहीं आता !


तुम्हारे शब्द भी कहां पढ़ पाता हूं ! ! !


बसन्ती बयार में

मचलती चिड़िया की चहकन

मुझे लिखने नहीं आती !


तुम्हारी हंसी भी कहां लिख पाता हूं ! ! !


पहली फुहार में

तर बतर भीजतें पलाश की बूंद बूंद खुशी

मुझे समझ नहीं आती !


तुम्हारी निःशब्द मुस्कुराहटे भी कहां समझ पाता हूं ! ! !


ठिठुरती रात के बाद

जवान हुयी ताजा धूप का अल्हड़पन

मुझे पीने नहीं आता !


तुम्हें आंख भर देख कुछ बोल कहां पाता हूं ! ! !

Sunday, May 23, 2010

दूब


बिना जिल्द की

वह फटी पुरानी कापी,

अपनी सब किताब की

ढेरी से मैं अलग रखा करता हूं

जिस पर बीच बीच में थककर

मैं कुछ नया लिखा करता हूं ।



वैसे तो पढ़ने की इस मेज पर

हैं बहुत कापियां

जिस पर मैं धरती और नक्षत्र

लिखा करता हूं


लेकिन दबी किनारे सबसे नीचे

बीते वर्ष की बची पन्नों वाली पर,

भीतर बढ़ती हरी दूब की

कचनारी कोंपले लिखा करता हूं ।


बिना जिल्द की

वह फटी पुरानी कापी,

अपनी सब किताब की

ढेरी से मैं अलग रखा करता हूं !

Wednesday, May 19, 2010

निर्मोही


तुम्हारे शब्दों में

कुछ फूल हॊते हैं !


उन्हें छूकर

मैं जाग जाता हूं !


जगाओगे नहीं मुझे ?

निष्ठुर !



तुम्हारी चहकन में

कुछ रंग होते हैं !


उनके परस से मैं

बहक जाता हूं !



बहकाओगे नहीं मुझॆ ?

पाथर !



इन रंग और शब्दों से

मेरी सांस बनती है !

आंखॊं में चमक पिघलती है

और

बातॊं में खनक फटकती है ! !



लेकिन तुम .......

चुप हो अब भी ?

कुछ तो कहो

निर्मोही !

Monday, April 12, 2010

प्रतीक्षा

ताजे नए
हरे पत्तों में , ,,
खूब मल कर
मुंह धोयी
और भी चटकार
गोरी हो ली जैसे ................

छोटे सफेद
गमकते फूलों
की लड़ियों से
गढ़ी
नीक नीक , ढेर -सी
चांदी की बाली ,,,,,,,,,
और अब
अंग अंग
धारे बैठी है
जोहती बाट
पहली मद्धिम बरसात की ! ! !

मै तो निरखूं
तुम्हें ही
ओ अकेली ! विलग, मुदिता
भरा बदन ,
गाढ़ मन ,
क्वारी नीम की डंठल !

Wednesday, March 24, 2010

जानता हूँ पर .......

जानता हूं
यह रास्ता कहीं नहीं जाता
फिर भी चल रहा हूं ।
जानता हूं
आगे कुछ नहीं है
फिर भी इसी पर
ढल रहा हूं ।

है अस्वीकार का साहस ।
प्रतिरोध की शक्ति है ।

जानता हूं हासिल हर जोड़ का
शून्य है
फिर भी
स्वयं को कर
एक विलम्बित मौन-सा
इस ही राह पर
बिछ रहा हूं………..

जानता हूं पर चल रहा हूं ………

Sunday, March 14, 2010

दिनों बाद .........


चलूं

आज दिनॊं बाद

लिखूं कुछ !

कॊई कविता !

हेरूं

मन को

पुरूं

गेहूं के टूण –सी

छोटी

गैरजरूरी

बातों के

टूटॆ धागे !

शब्दों को धोऊं,

पॊछूं

बांधू उनकॊ

धागे में

भावॊं के जुलहे की पूंछ में

टांकू उसे

छोड़ू उसे

भागे वह

द्वारे द्वारे

फूले फूले

नदी किनारे

तीरे तीरे

दौड़ू मैं भी

पीछे पीछे ! !

आज दिनों बाद !

Wednesday, March 3, 2010

प्रेम दीक्षा



शिशिर !

न मालूम था
मुझे कि
दिन दिन
पल पल
रव रव
तुम्हारे दुलार के
सान्द्र सोम में
छका है
पगा है
डूबा ,
उतराया है !
यह आम्र वृक्ष !

न मालूम था
मुझे कि
स्नेहातुर लजीले
तुम्हीं ने
फैलाकर बहुत बार
गाढ़े शुभ्र कोहरे
की यवनिका
इस तृषित ढीठ
आम्र वृक्ष से
बहुत देर तक की है
एकान्तिक प्रणय केलि !

और इस नश्वर प्रणय के
क्षणिक व्यापार में ही
किया है दीक्षित उसे
निर्धूम
निःशब्द
अव्यय
प्रेम-शिखा-संकुल में ! ! !

न मालूम था मुझे
लेकिन
देखो ! ! !
वह भोला !
वह ढीठ !
तुम्हारी इस
दारुण विदा घड़ी में
कैसा भकुवाया ,
चुप है !

अब तुम नहीं होगे
पास उसके !
इस ताप में
दह रहा है !
खुद को
मह रहा है !
इतने दिनों
सिखाया है जो
प्रेम तुमने
वह अब
इस अन्तिम घड़ी में
हरे गमकते
बौरों के
गदराये छन्दों में
कह रहा है !

Wednesday, February 24, 2010

केसरिया मन


सोचता हूं सो जाऊं !
खो जाऊं !
बोझिल तन !
स्नेहिल मन !
निढाल सब छोड़ू !
मिट जाऊं !
लेकिन फिर ……….
सांझ थोड़ी देर तक की
तुम्हारी संगति याद आती है -------


तुम्हारे सानिध्य का केसर
अभी तक
मन की देह पर बिखरा हुआ है !


तुम्हारे सरल मधुर हास का चन्दन
अभी भी झींना झींना
आती जाती सांसों में गमक रहा है !


याद आता है तो कस्तूरी बन गया लगता है
विदा के अन्तिम क्षणों में
तुम्हारे उन पंकिल पलकॊं का
करुणामय आरोहण अवरोहण ! ! !

सदा रहेगा
चाह में तेरी
यह केसरिया मन ! !

Saturday, February 13, 2010

प्यार : एक डायाक्रोनिक स्टडी -2




एक प्यार
धीरे धीरे होता है ।
एकदम धीरे धीरे ।

जैसे रात भिगोये गये चने से
धीरे धीरे निकलता है
चने में मौजूद पूरे प्रोटीन से बना
एक टुइंया-सा अंकुर !

यह प्यार
शुरु शुरु में प्यार नहीं होता
लेकिन परत दर परत
प्यार बनता जाता है ।
आप पा सकते हैं
जगजीत सिंह और गुलाम अली की गजलॊं में
इस तरह के प्यार के
तमाम शिलालेख !

एक प्यार
फटाफट होता है ।
एकदम फटाफट ।

जैसे बच्चों के खेलने वाले
बड़े गुब्बारे में
किसी ने चुभो दी हो
नुकीली सुई ।

यह प्यार
शुरुआत क्या
शुरुआत के पहले से ही
प्यार ही होता है !

इस प्यार में सब चीज –
आंखों के खुलने से लेकर
आंखॊं के बन्द होने तक
सांसॊं के अन्दर लेने से लेकर
सांसों के बाहर जाने तक,
सब!
बस प्यार ही प्यार होता है ।

अब संक्षेप में कहा जाय तो
दोनों प्यारों के
अपने अपने धन और ऋण हैं !

(हांलाकि प्यार के संविधान में तो
धन और ॠण सोचना सख्त वर्जित है,
तो प्रेमी जन माफ करें ! ! ! )

एक प्यार हेलीकाप्टर तो
दूसरा मिग – २१ है !
कहने का मतलब की
इसकी कुछ बातें उसमें
और उसकी कुछ बातें इसमें
ले ली जाय
तो
चांद तक पहुचा जा सकता है !

(अन्यथा तो कोई चान्स नहीं)

Thursday, January 28, 2010

प्यार: एक डायाक्रोनिक स्टडी-1


प्यार
तरह तरह के होते हैं ।


किसी बीते हुये प्यार को
याद करना , पुनः प्यार से भर उठना
एक अलग प्यार है ।

किसी चल रहे प्यार को सोच कर
धीरे से मुस्कुराना , फिर तुरन्त
काम में व्यस्त हो जाना
एक अलग प्यार है ।

किसी दूसरे के प्यार को
देखकर ,दो बूंद
खुद के बारे में सोचना
एक अलग प्यार है ।

वे प्यार जो हुये ही नहीं
और वे प्यार
जो होते होते रह गये,
सब को सोच कर
मन में भर जाने वाला प्यार
एक अलग प्यार है ।

इसी तरह
एक नये प्यार की
सुकुमार व सुन्दर कल्पना करना ,
उस नये सौन्दर्य में खो जाना
एक अलग प्यार है ।
अब यहां
सब प्यार अलग अलग प्यार है ।
लेकिन
अच्छी बात यह है कि
सब
प्यार ही है ।

Sunday, January 10, 2010

बात


गर्म टहकार,
कुनकुनी पीली ,
चमकीली उत्फुल्ल,
धूप
सिर्फ धूप नहीं है ।

दरसल वह एक बात है ।
बात –
जो सूरज धरती से किया करता है ।
रोज रोज , हर रोज ।

उसके कई अर्थ हैं ।
अनेक भाव ,
गन्ध ,
भंगिमाएं ,
कहानियां हैं ।
धरती की छाती पर टंकी
छोटी से छोटी घास से लेकर
वृहद देवदारू व वटवृक्षों तक की
व्यथा कथाएं हैं ,
आत्माभिव्यक्तियां हैं,
उल्लास के गीत हैं ,
शोक के मौन आख्यान हैं,
सूरज जिन्हें
हर रोज चुपचाप
धरती से कहता सुनता है ।

दरसल
धूप की यह ऊष्मा
सूरज का दुख है !
प्राजंल मोदक हरितिमा से आवृत्त
ये वृक्ष
वस्तुतः
सूरज के स्वप्न हैं ।
सूरज
अपने गुह्यतम सुनसान तापगर्भॊं में
इन हरे भरे वृक्षों के स्वप्न -चित्र
संजो कर रखता है ।

Sunday, January 3, 2010

सब कुछ शेयर कर लेता हूँ !

कलिंग युद्ध क्षेत्र पर छिड़ा घमासान अभी धीरे धीरे शान्त हो रहा है । वहां बहुत कुछ लिया गया और बहुत कुछ दिया गया । इन सब के बीच बहुत कुछ ऐसा भी रहा जो देते देते नहीं दिया गया ………..अतएव लेते लेते नहीं लिया गया । खैर , चल रही प्रक्रियाओं को देखते देखते घुन जैसा एक प्रश्न मन में किर्र किर्र करने लगा कि क्या सब कुछ साझा किया जाना जरूरी है ? अगर किसी ने कुछ कहा (यहां सही या गलत के किसी वैल्यू जजमेन्ट की कोई बात नहीं है।) तो क्या यह जरूरी है कि उससे उपजे अर्थ एवं अर्थ से वाष्पीकृत हो मनःतल पर जमी भावनाएं सबसे बांटी ही जाय ? या दूसरे शब्दों में , प्रासंगिकता से अलग थोड़े व्यापक परिपेक्ष्य में , भीतर के व्यक्ति को जो अनुभूतियां वाह्य समाज से जोड़ती हैं , उनका प्रकार कैसा हो ?

कल दोपहर जब टुन्ना भईया ने फोन किया कि तैयार रहना शाम को अरविन्द जी के यहां चलना है तो लगा कि अब घुन के लिये “मैलाथ्यान ” का इन्तजाम हो जायेगा । ससुराल में पहली बार सबके लिये रसोईं तैयार करती, डरती , सकुचाती दुल्हन सी सांझ की शुरुआत में ही मैं लंका से नाटी इमली के लिये निकल गया । कैम्पस में , जहां तापमान हमेशा सामान्य से दो तीन डिग्री कम ही रहता है , काली साफ सड़कॊं के किनारे लाइन से खड़े ,कोहरे की सफेद चादर ओढ़े , पीले रोड लैम्पों का अलाव तापते , हरे पेड़ शेली का वेस्ट विंड गा रहे थे ………”इफ़ विन्टर कम्स , कैन स्प्रिंग बी फ़ार बिहाइण्ड ? ……।”

नाटी इमली चौराहे पर टुन्ना भईया एवं हेमन्त भईया पहले से ही थे । हम सभी अरविन्द जी आवास पर पहुंचे । वहां पहुच कर एक चीज का मैं बेसब्री से इन्तजार कर रहा था ---अगर वह थोड़ी और देर तक न आती तो ---मैं मांग ही बैठता ---लेकिन आ ही गयी – गरमागरम काफी ।
बातचीत शुरु हुयी । ब्लाग्स, ब्लागर्स एवं ब्लागराएं ।

ब्लाग जगत में जिन चीजों को लेकर बहुत गंम्भीर एवं पर्याप्त हो हल्ला मचा हुआ है उन पर अरविन्द जी को बोलते हुये सुनकर लगा कि वे इन सब चीजों में पूरी तरह संलग्न होकर भी सारी चीजों से एक स्तर पर एकदम पृथक हैं । किसी बात के बीच या अन्त में उनके जोरदार एवं भरपूर ठहाके मेरी इस ’सोचान’ को न जाने क्यॊं पुष्ट करते रहे ।

इन सब के दौरान हम सभी ओझा जी का इन्तजार भी कर रहे थे ।पहुंचने वाले तो वे चार ही बजे थे लेकिन बलिया से उन्होंने पैसेन्जर ट्रेन पकड़ ली और अपने आप को ऐसी परिस्थितियों में डाल दिया जहां उनकी धैर्य एवं सहनशीलता इत्यादि संचित उदात्त मनोवृत्तियों की पूरी परीक्षा हो सकती थी । …….(हुयी भी।)
बातॊं बातों में कुछ देर के लिये मुझसे मेरा प्रश्न कुछ विस्मृत सा हुआ था कि किसी बात पर अरविन्द जी ने कहा कि मैं किसी भी चीज को वैयक्तिक तौर पर नहीं लेता । जो चीज बाहर से मिली है उसे जी कर फिर पूरा का पूरा लौटा देना ही अच्छा समझता हूं । सब कुछ “शेयर” कर लेता हूं । सब सामने रख देता हूं । (फिर एक जोर का ठहाका !)
सुना मैंने । सुनता रहा ।
तभी फॊन आया कि ओझा जी की ट्रेन बनारस के सिटी स्टेशन पर आ गयी है । ड्राइवर(शैलेन्द्र) के साथ मुझे ही उन्हें रिसीव करने जाना है ।
रात के करीब बारह बजने वाले हैं बाहर ठण्ड सोलह साल की हो गयी है । बनारस सो गया है । कुहरा कम है । सर्द ठण्डी हवाओं से जलते कुत्तों के पिल्ले टें टें कर रहे है ।चलती गाड़ी में शैलेन्द्र मेरे जैकेट को कुछ देर तक बहुत ध्यान से देखता रहा । फिर बोला , आपको ठण्ड लग रही होगी , चाहें तो मेरा कम्बल ले सकते हैं । उसने देखा नहीं होगा लेकिन हल्की सी मुस्कराहट अनायास तैर आयी मेरे होठॊं पर । कुछ पन्क्तियां याद आ रही थी , उनके अर्थ भी स्पष्ट हो रहे थे धीरे धीरे----“(जीवन सर्वदा ही वह अन्तिम कलेवा है जो जीवन दे कर खरीदा गया है और जीवन जलाकर पकाया गया है और) जिसका साझा करना ही होगा क्योंकि वह अकेले गले से उतारा ही नहीं जा सकता—अकेले वह भॊगे भुगता ही नहीं। ”