Friday, November 27, 2009

शब्द यदि झुक गए !


शब्द जब
बध गये
छन्द में तो
“घनत्व” कैसे
करेंगे वहन ?


शब्द जब
ढल गये
छन्द में तो
झेलेगे कैसे
अपने अर्थों की
गुह्य अंतःक्रियायें ?

शब्द जब
झुक गये
छन्द में तो
सहेगें कैसे
वाक्य विन्यास की
कोठर--पैठी
नयी विकसती
अर्थ भंगिमायें ?

तब की बात
कुछ और थी ,
अब मामला
थोड़ा अलग है।
आनाजाना ठीक है
सांसो का, लेकिन
बीच बीच में
हिचकी हिचकियां
कौन कहेगा ?
नयी अराजकताएं
कौन धरेगा ?


शब्द यदि बध गये …..
शब्द यदि ढल गये …….
शब्द यदि झुक गये…….

Tuesday, November 24, 2009

फिर से

तब तक एक पुरानी कविता फिर से पढ़ ले ! क्योकि समय कुछ शब्दों के अर्थ बदल देता है........

कविता की खोज में