Thursday, November 19, 2009

अ अस्वीकार


मैंने जाना
कि
वह करना,
उसमें होना,
गलत है ।

मैंने उसका निषेध किया ।
खुद को उसकी तरफ बहने से रोका ।
उसके प्रति भीतर अपने
वह स्वभाव रचा
जो
अनुभव
अनुभूतियों
व निष्कर्षों पर आधारित था ।
मैंने विजय पायी क्योंकि
अन्ततः
उसके और अपने अंतर्संबंधो का निर्धारक
मैं था !

अब , जब
मेरा उससे कोई लेना देना नहीं है
तो मैं

उसके विरोध में भी नहीं हूं !

Sunday, November 15, 2009

प्रेम गीत


सोचता हूं लिखूं मैं भी कोई प्रेम गीत !

लिखूं सांझ की उतरती उदास धूप में
पीली रोशनी के वलय-सा जगमगाता कनेर !


लिखूं भॊर की पहली किरन को
रंगों के गीत पढ़ाता जवांकुसुम !

लिखूं निशा- वियोग- व्याकुल, वृन्त-प्रछ्न्न
उषा के नासापुटों का गन्धमादक श्वेत नारंगी पारिजात !

लिखूं दूब की पलकों पर रजत स्वप्निल तुहिन कन देख
शिशिरागमन संदेश प्रमुदित आम की चमकीली नयी कोपल !

सोचता हूं लिखूं मैं भी कोई प्रेम गीत !
लिखूं चिड़िया !
लिखूं तितली !
लिखूं हवा !
और
फिर
धूप ! ! !