Wednesday, October 14, 2009

प्रतिदान


यदि कभी


कुछ दूँ



मैं तुम्हें



तो तपाक से



थैंक्यू न बोलना !!!






(अच्छा नही लगता


बिलकुल भी ! )




लेना .......



चुप रहना .........



फिर हल्का सा .......



बहुत धीरे से.....



मुझे देखते हुए



मुस्कराना ......



बस





Monday, October 12, 2009

10 अप्रैल 2009 (डायरी से .......)


सब खाली खाली है.......... । परीक्षाएं खत्म हो गयी हैं ....। दस दिन हो गए .........। लगभग सब अच्छा ही गया है । कम्प्यूटेशनल लिग्विंस्टिक्स व लेक्सिकोग्राफी के पेपर में कुछ कठिनाईयों के अलावा । पिछले चार पांच दिनों में कुछ खास नहीं किया है । नींद ……….और खूब नींद……..। नींद भी कितनी गज़ब की चीज़ है । कुछ पलों के लिये जिन्दगी से मोहलत ।खुद से मोहलत ।हर उस चीज से मोहलत जिनसे हम बनते हैं। तो अभी कुछ आगे की प्रवेश परीक्षाऒं की तैयारी का प्रपंच कर रहा हूं ।
बिलकुल ठण्डा पड़ा हुआ हूं....... । बेहद..... साधारण सी जिन्दगी जीता हुआ........... । भटकनें तो हैं---भटकनें , मतलब वो चीज़ें जिन्हें मैं खुद से जुड़ा नहीं देखना चाहता या वे चीज़ें जिन्हें मैं खुद को करता हुआ नहीं देखना चाहता !!!........... वे हैं तो………. लेकिन वे भी मरियल सी पड़ी हुयी हैं किसी किनारे क्यॊकिं मैं उनका कोई मजबूत विरोध ,जैसा करता रहा हूं अब तक , नहीं कर रहा हूं । वे भटकाती हैं । मैं भटक जाता हूं । वे बुलाती हैं । मैं उनके साथ उठकर चल देता हूं ।अन्ततः वे फिर मुझे वापस छोड़ जाती हैं ।मेरे पास । अकेले । वे बस थोड़ा सा थका देती हैं । मैं सो लेता हूं । सांझ को उठता हूं । चिप्स खाकर चाय पीता हूं । सोये सोये उपन्यास पढता हूं ।

जिन्दगी शायद बिना किसी कारण के भी जीयी ही जा सकती है । बस ऐसे ही जीना……….. । कुछ आभास , जो परिस्थितियों द्वारा निचोड़े जाने पर हममें सिलवटॊं की तरह बच गये हैं और जो हमें सदा अनिश्चित ढ़ंग से किसी निश्चित दिशा , किसी तरफ ढकेले जा रहे हैं ……………वे किसी “कारण” के रूप में नहीं देखे जा सकते । वे हैं और वे चीज़ों को पैदा भी कर रहे हैं लेकिन वे कारण नहीं हैं । वे इतने नीचे हैं कि इतने उपर घट रहे किसी कार्य से कारण के रूप में उनका कोई सम्बन्ध नहीं जुड़ सकता ।