Saturday, October 3, 2009

गोल्डिग ! वे बच्चे नहीं थे ! *

विलियम गोल्डिंग अंग्रेजी के एक महान उपन्यासकार हैं । अपने प्रसिद्ध नोबल पुरस्कृत उपन्यास “लार्ड आफ़ द फ़्लाइज़” में इन्होंने दिखाया है कि बच्चे भी निर्दोष (Innocent) नहीं होते ।उपन्यास में एक स्कूल के बारह वर्ष तक की उम्र के बच्चों का एक दल छोटे से सुनसान द्वीप पर बिना किसी वयस्क के पहुच जाता है । जीवन के लिये उपयुक्त सभी परिस्थितियों के होते हुये भी ये बच्चे अन्ततः हिंसक हो उठते हैं एवं एक दूसरे की हत्या करने लगते हैं


वे बच्चे नहीं थे ,
गोल्डिंग ! ! !
मैं कहना चाहूंगा तुमसे
कि जिन्हें
छोड़ा था तुमने
उस निर्जन सुनसान
प्रौढ़ रहित द्वीप पर
वे बच्चे नहीं थे !

वे मात्र
परावर्तन थे
“विकसित” “आधुनिक” व “सभ्य”
मानव की उत्क्षिप्त ,
विकराल व भ्रष्ट अवधारणाऒं के ।

जिन्होंने
अपने बालपन के
सहज सारल्य व
नैसर्गिक सौन्दर्य की अनुपम सुषमा
को बिसारकर कलुषित करते हुये
तुम्हारे रचे उस स्वप्न द्वीप में
मानवीय अन्तःस्थल स्थित
सहजात पाशविक विषण्णता का
पुनरारम्भ किया ,
वे बच्चे नहीं थे ,,,,
वे बस
उन स्मृतियों के विकास मात्र थे
जिसमें मां ने पहली बार
अस्वीकार की थी उनकी कोई मनुहार
और प्राप्त हुआ था उन्हें
बर्बर झिड़कियों से युक्त
एक हिंसक प्रत्युत्‍तर ! !

पारस्परिक विद्वेषों व
आन्तरिक स्वार्थों के वशीभूत हो
जो अन्ततः करने लगे थे
एक दूसरे की नृशंस हत्यायें ,
वे बच्चे नहीं थे !
वे बस
उन प्रकियाऒं के विश्लेषण मात्र थे
जिसमें
एक छोटी सी गलती पर,
कक्षा में उनकी द्वितीयता पर
पिता ने तोड़ दी थी
क्रूरता की सारी हदें
और दिया था उन्हें
हिंसा एक नवीन संस्कार !!!!

वे बच्चे नहीं
मात्र
परावर्तन थे ।


*यह कविता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से प्रकाशित होने वाली पत्रिका “सम्भावना” ,मार्च २००७ में छप चुकी है । यहां थोड़े से सुधार के साथ पुनः प्रस्तुत कर रहा हूं।

Thursday, October 1, 2009

सत्य के साथ प्रयोग अभी जारी है !!!



लकड़ी के डण्डों पर टिकी
मुरचहे टीन की छत , पोलीथीन की दिवारें !
जुलाई महीने की सड़ी उमस भरी रातों में
आसपास की बजबजाती नालियों में जवान हुये
मोटॆ मटमैले मच्छर
चीथड़ों से बार-बार उघर आती
उसकी टांगॊ को
बड़ी आसानी से सूंघ लेते है ।
सामने टाट पर
बगल के भव्य मकान की
यहां तक पहुच रही मध्दम पॊर्च लाइट में
रिक्शा चालक
उसका दारूबाज निकम्मा
सूखे सैजन जैसा बाप
पसरा रहता है और
उसकी पतली टागों पर
लिपटी चिचुकी चमड़ियों से
थोड़ा और खून चूस लिया जाता है ।
वह छटपटाता है ।
दर्द से बिना आवाज चिल्लाता है ।
…….लेकिन जोर से रोता नहीं ।


जोर-से रोता नहीं
इसलिये नहीं कि रोकर वह
बल्ब के आसपास फडफडाते
बरसाती कीड़ों जैसी मां से
बेवजह दो चार झापड़ खाना नहीं चाहता ।
इसलिये नहीं कि
बार बार रोने के लिये भी
दम चाहिये ,
छाती में अन्न का जोर चाहिये !
इसलिये नहीं ………
वह जोर से रोता नहीं क्योंकि
वह प्रयोग कर रहा है ।

बधायी हो गांधी जी ! ! !
सत्य के साथ प्रयोग अभी जारी है ।

घाटी की सफेद सुर्ख बर्फ को
डर है कि कहीं वह
“लाल ” सोखते सोखते
अपनी सफेदी न खॊ दे !

रंगीन खुशमिजाज पक्षी सब सोच में हैं
कि बच्चे उनके
सुमधुर नैसर्गिक कलरव के बजाय
कहीं बन्दूकॊं व बमों की तड़तड़ाहट सा
बोलना न सीख जांय !

मुम्बई में ताज के बाद अब
दूसरे बड़े होटल
अपनी बारी के इन्तजार में हैं क्योंकि
हमले का मास्टर माइण्ड अभी वहां
कुछ राजनैतिक शिरकतों में व्यस्त है !!

इन सब के बावजूद
बातचीत जारी है ,
माननीय जन लगे हुये हैं
ब्याह में बचे खुचे पत्‍तल चाटते कुत्तों--सी वार्ताऎ
निरन्तर है !!

बधायी हो गांधी जी !
सत्य के साथ प्रयोग अभी भी जारी है ।