Friday, December 26, 2008

शेष तुम्हारी इच्छा . . .


मैं
चाहता हूं तुम्हें
या नहीं,
कह नहीं सकता ।

मैं बस तुम्हारा ही हूं
या नहीं ,
कह नहीं सकता ।

तुम्हारे एक कहने पर
दे दूंगा जान
या नहीं
कह नहीं सकता ।

यदि चाहो तुम
कोई आश्वासन ,कोई वादा
तो कह सकता हूं बस यही
कि
जो भी रहूंगा ,
जैसा भी रहूंगा ,
जितना भी रहूंगा ,

रखूंगा सम्मुख तुम्हारे
स्वयं को पूरा पूरा
बिना किसी तह और सिलवट के !


शेष तुम्हारी इच्छा . . . .. . .!

Tuesday, December 23, 2008

संपृक्त




मेरी सफलताएं
और असफलताएं ! ! !

बीच इनके
कभी इधर तो कभी उधर
ढुळकता
आधारहीन अनअस्तित्व मैं !

सफलताएं जब
आसपास खड़ीं हो जाती हैं आकर
तब
वे सब
चाहने लगते हैं मुझें !

दुलारते हैं ,
पुचकारे हैं ,
सम्मान देते हैं ,
बताते हैं कि
बडे़ अच्छे हो तुम ,
प्यारे! प्यारे !

और
असफलताओं की शीतलहरी में जब
यकायक बिखर जाते हैं उत्कर्ष के सारे विकल्प
तब उनकी आखों में फफकती घृणाओं का
एकमात्र हेतु व गन्तव्य हो उठता हूं मैं !
मुझे वैसे ही जर्जर व हीन छोड़
तत्क्ष्ण ही मेरे विकल्प की तलाश में जुट जाते हैं सब! ! !

वैसे तो स्वाभाविक ही है
घृणा और प्रेम का यह चक्र
और नियति जान
इसे
अकुण्ठ
स्वीकारता भी हूं मैं ,
किन्तु !
क्षोभ ! ! !
कि उनके प्रेम और घृणाओं के
अन्तःस्थलों में भी
कहीं नहीं होता मैं . . .
होती हैं . . . .बस . ....
मेरी सफलताएं
मेरी असफलताएं ! ! !