Tuesday, November 11, 2008

अपना कच्चा चिठ्ठा

बेवकूफ किस्म का एकदम निठ्ठ्ल्ला लड़का हूँ. सोकर सुबह आठ बजे उठता हूँ. नौ बजे रूम से लगभग एक कोस दूर फैकल्टी के किसी बूढे से क्लासरूम में किसी नहाए-धोये चमचमाते प्रोफोसर के सामनें हाफता, आंख मींजता भरसत: मौजूद ही रहता हूँ । बीए का विद्यार्थी हूँ .भाषा विज्ञान लेकर तीसरे साल में हूँ बी एच यू से.कोई भी काम मेरा, मेरे ही द्वारा सही समय पर पूरा हो जाय यह तो बिलकुल आश्चर्य की बात हो सकती है . आज करै सो काल करै ,काल करै सो परसों.सबसे ज्यादा मजा आता है मुझे खूब चौचक, तानकर सोने में. अब तो जाड़ा भी आ रहा है . सोने का तो लुत्फ़ ही बढ जाता है. यह काम मुझे इतना प्रिय है की एक-दो घंटे की भी सिंटेक्स – मार्फाल्जी की लम्बी पढाई पर निकलने से पहले एक दो खर्राटे भिड़ा लेना पसंद करता हूँ.पढ़ाई के नाम पर आसपास के लोगों को बेवकूफ बनानें में खूब मजा आता है. हमेशा कमरे में ही घुसा रहता हूँ. लगता है की खूब पढ़ रहा हूँ. लेकिन जो करता हूँ वह तो मैं ही जानता हूँछुटपन से ही कापियों के पिछले पन्ने पर कुछ न कुछ ताना-पुरिया करते रहनें की आदत थी।समझदार लोगों ने ‘समझाने’-‘बुझाने’ का बहुत प्रयत्न किया लेकिन सब व्यर्थ गया.कुछ एक मास्टर साहब की गुप्त मदद से कुछ अपने जिद्दी स्वभाव से आदत बिगड़ती ही चली गयी. कैंसर और एड्स की दवा तो खोजी ही नहीं जा सकी है आजतक तो इस रोग का इलाज कहा से संभव हो पाता…..कुछ बहुत अच्छा बहुत अच्छे ढंग से तो कहने नहीं आता मुझे . बहुत उद्धत हूँ सो ज्ञान कहाँ !फिर भी थोडा बहुत तीर-तुक्का भिड़ा ही लेता हूँ.शेष स्वयं ही निरखें….

कुछ , जो पड़ा और सुना

बहरा हूँ मै तो चाहिए कि दूना हो इल्तिफात
सुनता नहीं हूँ बात मुकरर कहे बगैर
* * * * * *

हम न समझे थे बात इतनी सी
ख्वाब शीशे के ,दुनिया पत्थर की .......
...रोशनी अपने साथ लायी थी साए
साए गहरे थे ...रोशनी हलकी ......
हम न समझे थे .......
***********


“सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का ख़ुद मजार आदमी
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयो का शिकार आदमी
हर तरफ़ दौड़ते भागते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी
रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतजार आदमी
फिर भी तन्हाइयो का शिकार आदमी
जिन्दगी का मुकद्दर सफर दर सफर
आखिरी साँस तक बेकरार आदमी ’’



* * * * * * * * *

“…….धुँआ बना के फिजा में उड़ा दिया मुझको
मै जल रहा था, किसी ने बुझा दिया मुझको …।

मैं एक जर्रा बुलन्दी को छूने निकला था
हवाओं ने थम के जमीं पे गिरा दिया मुझको . . . .
धुआं बना के फिजा में
..."

Sunday, November 9, 2008

नियति




कोई एक अच्छा आदमी ,
जो फितरत से भीतरी तौर पर एक कलाकार था,
खाली बैठा था।


यकायक उसे
एक खुराफात सूझी.

सामने पड़े ईटों के
एक बेतरतीब ढेर को
वह
बड़े करीने से सजाकर
छोटी सी प्यारी सी इमारतनुमा कुछ
सिरजने लगा ।



कई बार उसने
बड़े मन से छोटे छोटे टुकडों को
वहां से यहाँ , यहाँ से वहां किया .
कही खाली था उसे भरा
कही भरा कुछ था उसे खाली किया .
इसतरह सुबह से लेकर साँझ तक
उसने हर एक तरकीब
ईटों पर आजमायी .
कुछ एक बार तो
दो चार अनजान ईटों ने
एक दूसरे का साथ दूर तक दिया
और स्वयं के रूप और गुण को
परस्पर ले दे
किसी अरूप कल्पना के संभाव्य आकार का
संकेतन किया
लेकिन बस कुछ ही दूर तक …..
और बार बार वे
लौट आयी
उसी आकार में
जो नियति उन्हें सौप गयी थी ।

तब उस अच्चे कलाकार में भी
धीरे धीरे यह बात उगने लगी की
बेतरतीब
एक देर बने रहना ही
नियति और स्वभाव है
इन बेवकूफ ईटो का ……

और तब , एक लम्बी सास ले वह उठा ,
धीरे से मुस्कुरा ,
अपने घर की और चलने के ठीक पहले
उसने बड़ी बेरहमी से
यू ही ,बेवजह
अभी भी तरतीब में खड़ी कुछ बेफिक्र ईटो को
एक धक्के से छितरा दिया ……

(तभी न जाने क्यों …
वे कुछ दो चार ईटे
हौले हौले पिघलने लगी
पिघलकर समाप्त होने लगी .
बड़ी निरीह ,आधी गल चुकी भीगी आखों से
ढलती साँझ में लौटते कलाकार को देखती………..)