Saturday, October 25, 2008

कला


कला एक
विवशता है.

मैं जानता हूँ कुछ शब्द
कुछ संरचनाएं
भावों की छोटी-सी उपज है मेरे पास
मैं, छटपटाता , बंद , इन्हीं शब्दों ,संरचनाओं के
लघु दायरों में अनवरत !


जब जब कोई नया उगा भाव
एक दंश मारता ,
कराहता मैं दर्द से
लतफत भागता हूँ इधर उधर
उफनता सिमटता ,
व्यथा की अन्तिम उठान तक ,
वेदना की हूक के अन्तिम श्रृंग तक
चेतना के लघु वातायनों में
विवश तजबीजता स्वातंत्र्य के नव उत्स ……


किंतु
अवश् परवश
गिडगिडाता
अंतत: जाता हूँ शरण
इन लुच्चे और छोटे शब्दों की
की दहकते स्वत्व में सांत्वना के कुछ फूल रोपूं........

वे सत्य गिरवी रख मेरा,
रीझ मेरी क्वारी वेदना के सौंदर्य पर,
मुझे अभिव्यक्ति देते हैं …….

और तब
मैं ख़ुद से बहुत दूर……
एक प्रतीयमान सत्य हो जाता हूँ
….एक आभास…एक धोखा ,विवश ! !

जैसे भुट्टे के खेत में
चिडियों को भगाने के लिए बिजूका……

ओलिवर ट्विस्ट , तुम मिले थे मुझे !

दो एक साल पहले चाल्स डिकेन्स की एक किताब में परिचय हुआ था इस पात्र से.मिलकर ये नहीं लगा की किसी उपन्यास का एक चरित्र है ये . बार बार ये लगा की कहीं देखा है इसे , कहीं मिला हूँ इससे ---


लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर
पटरियों के बीच
जीवन जैसी बजबजाती सड़ती बस्साती नालियों में,
खाली पड़े दोनों,खोखले पैकेटों में
अपने अस्तित्व का एकमात्र अर्थ खोजते
ओलिवर ट्विस्ट ,मिले थे तुम मुझे !

शरद की भभकती ठण्ड में
प्लेटफार्म नंबर तीन के चबूतरे पर
बिछाए सारी जमीन
आदमी के वजूद जैसे चीथड़े ओढे
दौड़ती ,हाफती ,ख़तम होती सासों से
ठंढ को फूंक-फूंक कर उडाते ,
विद्रूपताओं के इस विशाल समंदर में
जीवन की नौका सम्हाले,हेमिंग्वे के उस बूढे आदमी
की विजय को पुन: साकार करते ,
ओलिवर ट्विस्ट ,मिले थे तुम मुझे !

काशी में भोले बाबा के उस भव्य प्रान्गण में
कोनचटे की किसी चाय की दुकान पर
संपूर्ण व्यवस्था में
सत्ता-अर्थ-शक्ति लोलुपता के मंथन से उदभूत
पाशविकता विष पान करते ,
मृत संवेदनाओं पर चीत्कार करते ,
ओलिवर ट्विस्ट ,मिले थे तुम मुझे !

खौलते दूध के भगौने से
निकलती भाप जैसी अपनी जिन्दगी लिए ,
व्यवस्था -नियंताओं पर
प्रश्नचिह्न जैसी आखें लिए
विजन ट्वेंटी के स्वप्न को मुह चिढाता
अनंत क्षोभ लिए,
ओलिवर ट्विस्ट ,मिले थे तुम मुझे !

Thursday, October 23, 2008

स्नेह -परस

आओ !
नेह -तुलिका से विगत के स्मृति- चित्र बनाएं…..!
स्नेह-रंजित ,मधु-सिक्त ,मृदु भाव रंग ,
आर्द्र –करुण- नम्र- आलोक प्राण
ईषत –उन्मत्त ,अमूर्त आकृति में भर
किसी नेहा की
एक व्यग्र तरल मंद स्मित रच जांय……

मैं


किसी बहुत प्रिय ने ही कहा था की बड़े हृदयहीन हो तुम , उसी के लिए -



जो हूँ ,वो तो होना ही पड़ेगा !


अब जो हूँ , वह होने में मेरा कोई चुनाव तो है नहीं , कोई हस्तक्षेप तो है नहीं ,


मतलब जो हूँ .............


वो हूँ ही !


तो ,जो हूँ, वो बने रहने के लिए मैं तब तक स्वतंत्र हूँ जब तक मेरे इस होने से


किसी अन्य को कोई कष्ट नहीं पहुंचता !



सो , मैं खुद को , बिलकुल खुद तक समेटता हूँ ,


अपने विष खुद उपजाता हूँ , खुद ही समोता हूँ !


अपनी आग पर खुद ही उबलता हूँ , भाप बनता हूँ , फिर चुपचाप पानी बन लौट आता हूँ !



मेरे बाहर का वातावरण तब मुझे क्षुद्र और स्वार्थी कहता है


और कहता है की मैं एक कीड़ा हूँ !


एक नन्हीं -सी आरामदायक उदासी के साथ मैं इसे स्वीकारता हूँ ,


यह स्वीकार अपने पीछे कुछ क्षोभ और एक भुरभुरी-सी असंतुष्टि छोड़ जाता है !



तब , मैं जो हूँ , उसके अलावा कुछ और होना चाहता हूँ .... ...फिर से ......


लेकिन तभी , कड़ाके की सर्दी -सा कोई अनजाना खौफनाक डर


आकर मुझे जकड़ लेता ही.......


और मैं दुबककर खुद में वापस घुस जाता हूँ ! ! !