Tuesday, December 30, 2008

चलो ! अच्छा हुआ

चलो अच्छा हुआ कि
तुम्हें भी कोइ और
मिल गया !
प्रतिशोध मुझसे जो था तुम्हारा
चुक गया !

विचरते मेरे दंभ के पठारों में
खो चुके जो स्वप्न थे सब तुम्हारे ,
उनको फिर से इक नया जहां मिल गया !

कैद मेरे स्वार्थ -सींकचों में
सन्त्रस्त भाव- विहग जो थे सब तुम्हारे
उनकों इक नया व्योम नीला मिल गया !

अपने को न जाने क्या समझते
एक झगड़ालू ,इर्ष्यालू और अहंकारी के
चंगुल से पूर्णतः मुक्त हुई तुम!
चलो !
अच्छा हुआ ,तुम्हें भी कोई और मिल गया !


Friday, December 26, 2008

शेष तुम्हारी इच्छा . . .


मैं
चाहता हूं तुम्हें
या नहीं,
कह नहीं सकता ।

मैं बस तुम्हारा ही हूं
या नहीं ,
कह नहीं सकता ।

तुम्हारे एक कहने पर
दे दूंगा जान
या नहीं
कह नहीं सकता ।

यदि चाहो तुम
कोई आश्वासन ,कोई वादा
तो कह सकता हूं बस यही
कि
जो भी रहूंगा ,
जैसा भी रहूंगा ,
जितना भी रहूंगा ,

रखूंगा सम्मुख तुम्हारे
स्वयं को पूरा पूरा
बिना किसी तह और सिलवट के !


शेष तुम्हारी इच्छा . . . .. . .!

Tuesday, December 23, 2008

संपृक्त




मेरी सफलताएं
और असफलताएं ! ! !

बीच इनके
कभी इधर तो कभी उधर
ढुळकता
आधारहीन अनअस्तित्व मैं !

सफलताएं जब
आसपास खड़ीं हो जाती हैं आकर
तब
वे सब
चाहने लगते हैं मुझें !

दुलारते हैं ,
पुचकारे हैं ,
सम्मान देते हैं ,
बताते हैं कि
बडे़ अच्छे हो तुम ,
प्यारे! प्यारे !

और
असफलताओं की शीतलहरी में जब
यकायक बिखर जाते हैं उत्कर्ष के सारे विकल्प
तब उनकी आखों में फफकती घृणाओं का
एकमात्र हेतु व गन्तव्य हो उठता हूं मैं !
मुझे वैसे ही जर्जर व हीन छोड़
तत्क्ष्ण ही मेरे विकल्प की तलाश में जुट जाते हैं सब! ! !

वैसे तो स्वाभाविक ही है
घृणा और प्रेम का यह चक्र
और नियति जान
इसे
अकुण्ठ
स्वीकारता भी हूं मैं ,
किन्तु !
क्षोभ ! ! !
कि उनके प्रेम और घृणाओं के
अन्तःस्थलों में भी
कहीं नहीं होता मैं . . .
होती हैं . . . .बस . ....
मेरी सफलताएं
मेरी असफलताएं ! ! !

Thursday, December 18, 2008

कभी कभी ,मेरे बावजूद


कभी कभी
मुझसे ही खुद को बचाते हुये
मेरे भीतर से कुछ -
सफ़ेद -नीले धुएं के पेंड़ सा
निकल आता है . . . .

कुछ ऎसा ,
जो बिलकुल
मेरे बावजूद होता है
और
स्वायत्त होता है ! !

(फिर भी),(लोभ वश )

मैं
जलते-बुझते सुनहरे शब्दों की लड़ियां
अपने वृ॒न्तों पर सजाये
उस कल्प-वृ॒क्ष को
(बस)
सहेजता हूं ,
प्रदर्शित करता हूं
अपनी औकात भूल ,
अपने गर्व में जोड़ता हूं , , , ,

और
भरसतः
बने ही रहने देता हूं
अपने इस भरम को
कि रचना यह
मेरी है

किन्तु
वस्तुतः तो
रचता
वही है मुझे .. . . .. .
अपने आविर्भाव में भी . . .
अपने अवगाहन में भी .. . .
अपनी अभिव्यक्ति में भी .. . . ..
कभी कभी , मेरे बावजूद ! !

Tuesday, December 16, 2008

तुम्हारी चुप्पी



तुम्हारी चुप्पी को
अस्वीकार समझ,
अपनी हार समझ,
खुद में वापस लौट गया मैं !

ढलती सांझ -से उदास मन में
पहले उगे तारे- सी
धुधंली, टिमटिमाती इक अन्तिम आस लिये
कि मेरे लौट जाने के बाद
शून्य मन ,कुछ देर तक खड़ें रहोगे तुम ,
उस रिक्त पथ को निहारते ... . .
जिससे लौट गया हूं मैं ! ! !

Monday, December 15, 2008

तुम्हारा चाहना


आकस्मिक मत समझना मेरी उस चुप्पी को
जो तुम्हारी उस निरभ्र, मध्दिम फुसफुसाहट

कि “मैं चाहती हूँ तुम्हें”
पर फैल गयी थी
पूरे मुझ पर !


चुप
या यूँ कहो कि
निरुत्तर ही रहना चाहता था मैं
अपने भीतर की अनजान अधेरी तहों में
इस फुसफुसाहट के ठीक इसी तरह

ख़ुद के लिए ही एक गंभीर प्रश्न
और फिर सहसा एक सरल उत्तर बन जाने तक……..

Monday, December 1, 2008

रेड अलर्ट

वही बगल में , पूना में था , जब हमला शुरू हुआ ! हमने सोचा था की बनारस वापस लौटने से पहले एक दिन बाम्बे भी घूम आयेंगें , राज ठाकरे की मुम्बई देख आयेंगें , लेकिन तब तक पता चला की ताज होटल में कुछ विक्षिप्त वहशी "मौत - मौत " खेल रहे हैं .......सब रेड अलर्ट हो गया है ......

दोस्त ने सुना तो बोला, चलो बहुत दिन से कुछ हुआ नहीं था !बड़ी शान्ति थी ! अब ठीक है ! फिर खबरों पे खबरें , विचार- विमर्श , संकल्प ,संगोष्टियां , वार्तायें ….और फिर अगले धमाके का इंतजार !

कहीं पढ़ा था की धर्म ही सब उन्नतियों का मूल है . देखता हूँ की सब अवनतियों का मूल भी यही है. खासकर तब जब वह अपनी यात्रा के वर्तमान में किसी गहन अंतर्भूत सत्य की उष्णता का अभाव झेलता प्रधानत: बहिर्मुख हो चला हो……

राजनीति या समाजशाश्त्र में वह कूबत नहीं , संलग्न धर्मो (में) / का नवोन्मेष ही इस भयवाद (आतंकवाद) के प्रशमन के कुछ सुंदर सूत्र सुझायेगा………….

Tuesday, November 11, 2008

अपना कच्चा चिठ्ठा

बेवकूफ किस्म का एकदम निठ्ठ्ल्ला लड़का हूँ. सोकर सुबह आठ बजे उठता हूँ. नौ बजे रूम से लगभग एक कोस दूर फैकल्टी के किसी बूढे से क्लासरूम में किसी नहाए-धोये चमचमाते प्रोफोसर के सामनें हाफता, आंख मींजता भरसत: मौजूद ही रहता हूँ । बीए का विद्यार्थी हूँ .भाषा विज्ञान लेकर तीसरे साल में हूँ बी एच यू से.कोई भी काम मेरा, मेरे ही द्वारा सही समय पर पूरा हो जाय यह तो बिलकुल आश्चर्य की बात हो सकती है . आज करै सो काल करै ,काल करै सो परसों.सबसे ज्यादा मजा आता है मुझे खूब चौचक, तानकर सोने में. अब तो जाड़ा भी आ रहा है . सोने का तो लुत्फ़ ही बढ जाता है. यह काम मुझे इतना प्रिय है की एक-दो घंटे की भी सिंटेक्स – मार्फाल्जी की लम्बी पढाई पर निकलने से पहले एक दो खर्राटे भिड़ा लेना पसंद करता हूँ.पढ़ाई के नाम पर आसपास के लोगों को बेवकूफ बनानें में खूब मजा आता है. हमेशा कमरे में ही घुसा रहता हूँ. लगता है की खूब पढ़ रहा हूँ. लेकिन जो करता हूँ वह तो मैं ही जानता हूँछुटपन से ही कापियों के पिछले पन्ने पर कुछ न कुछ ताना-पुरिया करते रहनें की आदत थी।समझदार लोगों ने ‘समझाने’-‘बुझाने’ का बहुत प्रयत्न किया लेकिन सब व्यर्थ गया.कुछ एक मास्टर साहब की गुप्त मदद से कुछ अपने जिद्दी स्वभाव से आदत बिगड़ती ही चली गयी. कैंसर और एड्स की दवा तो खोजी ही नहीं जा सकी है आजतक तो इस रोग का इलाज कहा से संभव हो पाता…..कुछ बहुत अच्छा बहुत अच्छे ढंग से तो कहने नहीं आता मुझे . बहुत उद्धत हूँ सो ज्ञान कहाँ !फिर भी थोडा बहुत तीर-तुक्का भिड़ा ही लेता हूँ.शेष स्वयं ही निरखें….

कुछ , जो पड़ा और सुना

बहरा हूँ मै तो चाहिए कि दूना हो इल्तिफात
सुनता नहीं हूँ बात मुकरर कहे बगैर
* * * * * *

हम न समझे थे बात इतनी सी
ख्वाब शीशे के ,दुनिया पत्थर की .......
...रोशनी अपने साथ लायी थी साए
साए गहरे थे ...रोशनी हलकी ......
हम न समझे थे .......
***********


“सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का ख़ुद मजार आदमी
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयो का शिकार आदमी
हर तरफ़ दौड़ते भागते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी
रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतजार आदमी
फिर भी तन्हाइयो का शिकार आदमी
जिन्दगी का मुकद्दर सफर दर सफर
आखिरी साँस तक बेकरार आदमी ’’



* * * * * * * * *

“…….धुँआ बना के फिजा में उड़ा दिया मुझको
मै जल रहा था, किसी ने बुझा दिया मुझको …।

मैं एक जर्रा बुलन्दी को छूने निकला था
हवाओं ने थम के जमीं पे गिरा दिया मुझको . . . .
धुआं बना के फिजा में
..."

Sunday, November 9, 2008

नियति




कोई एक अच्छा आदमी ,
जो फितरत से भीतरी तौर पर एक कलाकार था,
खाली बैठा था।


यकायक उसे
एक खुराफात सूझी.

सामने पड़े ईटों के
एक बेतरतीब ढेर को
वह
बड़े करीने से सजाकर
छोटी सी प्यारी सी इमारतनुमा कुछ
सिरजने लगा ।



कई बार उसने
बड़े मन से छोटे छोटे टुकडों को
वहां से यहाँ , यहाँ से वहां किया .
कही खाली था उसे भरा
कही भरा कुछ था उसे खाली किया .
इसतरह सुबह से लेकर साँझ तक
उसने हर एक तरकीब
ईटों पर आजमायी .
कुछ एक बार तो
दो चार अनजान ईटों ने
एक दूसरे का साथ दूर तक दिया
और स्वयं के रूप और गुण को
परस्पर ले दे
किसी अरूप कल्पना के संभाव्य आकार का
संकेतन किया
लेकिन बस कुछ ही दूर तक …..
और बार बार वे
लौट आयी
उसी आकार में
जो नियति उन्हें सौप गयी थी ।

तब उस अच्चे कलाकार में भी
धीरे धीरे यह बात उगने लगी की
बेतरतीब
एक देर बने रहना ही
नियति और स्वभाव है
इन बेवकूफ ईटो का ……

और तब , एक लम्बी सास ले वह उठा ,
धीरे से मुस्कुरा ,
अपने घर की और चलने के ठीक पहले
उसने बड़ी बेरहमी से
यू ही ,बेवजह
अभी भी तरतीब में खड़ी कुछ बेफिक्र ईटो को
एक धक्के से छितरा दिया ……

(तभी न जाने क्यों …
वे कुछ दो चार ईटे
हौले हौले पिघलने लगी
पिघलकर समाप्त होने लगी .
बड़ी निरीह ,आधी गल चुकी भीगी आखों से
ढलती साँझ में लौटते कलाकार को देखती………..)

Saturday, November 1, 2008

(०)
गहरा है तो क्या !
खारा है …
उथली है तो क्या !
मीठी है …..

स्थिर है तो क्या !
सिर्फ़ संचय जानता है ….
बहती है तो क्या !
देना जानती है …

विशाल है तो क्या !
लहरों में लयहीन फुफकार है..
लघु है तो क्या !
लयमय कल कल सुर है …

गंभीर,स्थित्प्रग्य है तो क्या !
ख़ुद में ही ठहरा हुआ है …
विगलित है तो क्या!
हुलसाती है , उफनती है ,
बिखरती है ,सिमटती है ,
ख़ुद को पूरा पूरा दे देना
जानती है…….

Wednesday, October 29, 2008

क्षणिकाएं

(१)
किसे नहीं पता की
सच क्या है .....! ! ! !
लेकिन ....................
(2)
कभी सोचा है तुमने !
हमेशा काली ही क्यों होती है ?
परछायी आदमी की !
(3)
चाहूँ तुम्हें ! ! ! !
!...!....!......!.....!
आख़िर कैसे ? ? ?
(4)
जरूरी है दुनियाँ में बुढ्ढे भी
क्योंकि बुढ्ढे चाहते हैं जोड़ना
हर टूटी चीज को !
(5)
आखिर भेद न सके तुम व्यूह
रूपसी के मधुर आह्वाहन का !
मानूँ कैसे पुरुष मैं तुमको ?

Saturday, October 25, 2008

कला


कला एक
विवशता है.

मैं जानता हूँ कुछ शब्द
कुछ संरचनाएं
भावों की छोटी-सी उपज है मेरे पास
मैं, छटपटाता , बंद , इन्हीं शब्दों ,संरचनाओं के
लघु दायरों में अनवरत !


जब जब कोई नया उगा भाव
एक दंश मारता ,
कराहता मैं दर्द से
लतफत भागता हूँ इधर उधर
उफनता सिमटता ,
व्यथा की अन्तिम उठान तक ,
वेदना की हूक के अन्तिम श्रृंग तक
चेतना के लघु वातायनों में
विवश तजबीजता स्वातंत्र्य के नव उत्स ……


किंतु
अवश् परवश
गिडगिडाता
अंतत: जाता हूँ शरण
इन लुच्चे और छोटे शब्दों की
की दहकते स्वत्व में सांत्वना के कुछ फूल रोपूं........

वे सत्य गिरवी रख मेरा,
रीझ मेरी क्वारी वेदना के सौंदर्य पर,
मुझे अभिव्यक्ति देते हैं …….

और तब
मैं ख़ुद से बहुत दूर……
एक प्रतीयमान सत्य हो जाता हूँ
….एक आभास…एक धोखा ,विवश ! !

जैसे भुट्टे के खेत में
चिडियों को भगाने के लिए बिजूका……

ओलिवर ट्विस्ट , तुम मिले थे मुझे !

दो एक साल पहले चाल्स डिकेन्स की एक किताब में परिचय हुआ था इस पात्र से.मिलकर ये नहीं लगा की किसी उपन्यास का एक चरित्र है ये . बार बार ये लगा की कहीं देखा है इसे , कहीं मिला हूँ इससे ---


लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर
पटरियों के बीच
जीवन जैसी बजबजाती सड़ती बस्साती नालियों में,
खाली पड़े दोनों,खोखले पैकेटों में
अपने अस्तित्व का एकमात्र अर्थ खोजते
ओलिवर ट्विस्ट ,मिले थे तुम मुझे !

शरद की भभकती ठण्ड में
प्लेटफार्म नंबर तीन के चबूतरे पर
बिछाए सारी जमीन
आदमी के वजूद जैसे चीथड़े ओढे
दौड़ती ,हाफती ,ख़तम होती सासों से
ठंढ को फूंक-फूंक कर उडाते ,
विद्रूपताओं के इस विशाल समंदर में
जीवन की नौका सम्हाले,हेमिंग्वे के उस बूढे आदमी
की विजय को पुन: साकार करते ,
ओलिवर ट्विस्ट ,मिले थे तुम मुझे !

काशी में भोले बाबा के उस भव्य प्रान्गण में
कोनचटे की किसी चाय की दुकान पर
संपूर्ण व्यवस्था में
सत्ता-अर्थ-शक्ति लोलुपता के मंथन से उदभूत
पाशविकता विष पान करते ,
मृत संवेदनाओं पर चीत्कार करते ,
ओलिवर ट्विस्ट ,मिले थे तुम मुझे !

खौलते दूध के भगौने से
निकलती भाप जैसी अपनी जिन्दगी लिए ,
व्यवस्था -नियंताओं पर
प्रश्नचिह्न जैसी आखें लिए
विजन ट्वेंटी के स्वप्न को मुह चिढाता
अनंत क्षोभ लिए,
ओलिवर ट्विस्ट ,मिले थे तुम मुझे !

Thursday, October 23, 2008

स्नेह -परस

आओ !
नेह -तुलिका से विगत के स्मृति- चित्र बनाएं…..!
स्नेह-रंजित ,मधु-सिक्त ,मृदु भाव रंग ,
आर्द्र –करुण- नम्र- आलोक प्राण
ईषत –उन्मत्त ,अमूर्त आकृति में भर
किसी नेहा की
एक व्यग्र तरल मंद स्मित रच जांय……

मैं


किसी बहुत प्रिय ने ही कहा था की बड़े हृदयहीन हो तुम , उसी के लिए -



जो हूँ ,वो तो होना ही पड़ेगा !


अब जो हूँ , वह होने में मेरा कोई चुनाव तो है नहीं , कोई हस्तक्षेप तो है नहीं ,


मतलब जो हूँ .............


वो हूँ ही !


तो ,जो हूँ, वो बने रहने के लिए मैं तब तक स्वतंत्र हूँ जब तक मेरे इस होने से


किसी अन्य को कोई कष्ट नहीं पहुंचता !



सो , मैं खुद को , बिलकुल खुद तक समेटता हूँ ,


अपने विष खुद उपजाता हूँ , खुद ही समोता हूँ !


अपनी आग पर खुद ही उबलता हूँ , भाप बनता हूँ , फिर चुपचाप पानी बन लौट आता हूँ !



मेरे बाहर का वातावरण तब मुझे क्षुद्र और स्वार्थी कहता है


और कहता है की मैं एक कीड़ा हूँ !


एक नन्हीं -सी आरामदायक उदासी के साथ मैं इसे स्वीकारता हूँ ,


यह स्वीकार अपने पीछे कुछ क्षोभ और एक भुरभुरी-सी असंतुष्टि छोड़ जाता है !



तब , मैं जो हूँ , उसके अलावा कुछ और होना चाहता हूँ .... ...फिर से ......


लेकिन तभी , कड़ाके की सर्दी -सा कोई अनजाना खौफनाक डर


आकर मुझे जकड़ लेता ही.......


और मैं दुबककर खुद में वापस घुस जाता हूँ ! ! !